समाअतें बैन कर रही हैं कि लोग हर-चंद बोलते हैं मगर कुछ ऐसे कि जैसे उन की ज़बान ओ लब के वो सारे हिस्से जो बरमला गुफ़्तुगू की सच्ची अदाएगी के लिए बनाए गए थे मफ़्लूज हो गए हैं बसर-ख़राशी की इंतिहा है कि सारी बातें जो अन-कही हैं तमाम चेहरों की लौह-ए-महफ़ूज़ पर लिखी हैं कोई बताओ कि जब किसी की ज़बान चेहरे का साथ छोड़े तो ऐसी हालत को क्या कहें हम? कोई बताओ कि जब बहुत से अज़ाब चेहरे ज़बान बन जाएँ तो ज़बानों को क्या लिक्खें हम? जो ये ज़माना है मिस्ल-ए-फ़िरदौस इन ज़मानों को क्या लिक्खें हम? ज़माम गोयाई जब ज़बानों के हाथ में थी हुरूफ़-ए-अबजद क़रार में थे ज़बान ओ लब के हिसार में थे
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है
Sandeep Thakur
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(गेब्रियल गर्सिमक्रूज़ के अंदाज़ में) जब वो पैदा हुआ तो उस की दोनों आँखें दहक रही थीं दोनों पपोटे फटे हुए थे पुतली की दीवार से लटके आँखों के पर्दे आगे से हटे हुए थे जब उस की आँखें हिलतीं तो दीवारों पे उन की लौ हिलने लगती थी वो पैदा होने से पहले सारे धोने धो आया था अपने जन्म का सारा रोना रो आया था
Waheed Ahmad
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हरी मस्जिद की हल्की धूप में ताज़ा वज़ू से गीले पाँव और टपकती आस्तीनों की चमक में लोग थे जो सफ़-ब-सफ़ अपना जनाज़ा पढ़ रहे थे सदर दरवाज़े से इक बारूद में डूबा हुआ जन्नत का सट्टा-बाज़ और हूरों का सौदागर अचानक सहव का सज्दा अदा करने को आया और हरी मस्जिद ने अपना रंग बदला क़ुर्मुज़ी दहलीज़ पर जितने भी जूते थे वो ताज़ा ख़ून पर पहले तो तेरे और फिर जमते लहू पर जम गए मैं बचपन में कई मुल्कों के सिक्के और टिकटें जमा करता था बयाज़-ए-ज़हन के तारीक पन्नों पर मैं अब जिस्मों के टुकड़े जमा करता हूँ मिरी एल्बम के सफ़्हों की तहों से ख़ूँ निकलता है मिरी आँखों से रिसता है
Waheed Ahmad
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(तीसरी दुनिया के तमाम लोगों के नाम) अजब हादसा है कि बचपन में हम जिन खिलौनों से खेले थे अब वो खिलौने हमारे ही हालात से खेलते हैं वो नाज़ुक मुजस्स में वो रंगीन गुड़ियाएँ तय्यारे पिस्तौल फ़ौजी सिपाही कभी जो हमारे इशारों के मोहताज थे आफ़रीं तुझ पे मेयार-ए-गर्दिश कि अब वो खिलौने हमें चाबियाँ भर रहे हैं हमारे मवेशी हमारे ही बाग़ात को चर रहे हैं खिलौनों के इस खेल में हम तो यूँँ खो गए हैं कि हर काम की हम से उम्मीद रख लो अगर कोई तकवे की चाबी घुमा दे तो दाढ़ी बढ़ा लें अगर कोई थोड़ी सी क़ीमत लगा कर किसी शख़्स का घर बता दे तो अगले ही पल में उस की गर्दन उड़ा दें हमारा है क्या हम तो अंधे मुअज़्ज़िन हैं बाज़ू पकड़ के जो गरजे में ले जाओगे तो भी मर्यम की तस्वीर के सामने उँगलियाँ कान में ठूँस लेंगे हमारा है क्या हम तो पत्थर की वो मूर्ती हैं जिसे चाहे सज्दा करो या तमाचा लगा दो मगर वो तो हाथों से छाती छुपाए सदा मुस्कुराती रहेगी
Waheed Ahmad
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ये होता है कोई माने न माने ये तो होता है किसी फैले हुए लम्हे किसी सिमटे हुए दिन या अकेली रात में होता है सब के साथ होता है बदन के ख़ून का लोहा ख़यालों के अलाव में उबल कर सुर्ख़ नेज़े की अनी को सर की जानिब फेंकता है और फिर शहतीर गिर जाता है जिस पर ख़ुद फ़रेबी पतली ईंटों की चिनाई करती रहती थी ये मेरा माल फ़ित्ना है मिरे माँ बाप साया हैं मिरी औलाद फ़ित्ना है बहुत तन्हा है इंसाँ कीमिया-गर के प्याले से गिरे क़तरे के पारे की तरह तन्हा सफ़र करते हुए तारों के झुरमुट में खड़े क़ुत्बी सितारे की तरह तन्हा ये सब हँसते हुए लब रोती आँखें हंजरे के जोफ़ से लहरा के निकली सारी आवाज़ें ये गाते नाचते लोगों के झुरमुट इश्वा ओ नाज़ ओ अदास खींचते पैकर ये सारी सैर-बीनी ख़ुद-फ़रेबी है ये सारी यार-बाशी और सब सहरा-नशीनी ख़ुद-फ़रेबी है मैं अपनी माँ के पहले दूध से दर्द-ए-तह हर जाम तक तन्हाई के इक ख़त पे चलता जा रहा हूँ मैं अकेला हूँ मैं बज़्म दोस्ताँ के क़हक़हों के गूँज में डूबे सराबी दश्त की लर्ज़िश में पानी ढूँडता हूँ मैं अकेला हूँ मिरी तन्हाई माँ जाई जो मेरे साथ पैदा हो के मेले में कहीं गुम हो गई थी मेरी बू की ढूँडती मेरे लहू को सूँघती वापस चली आई है मेरे सामने बैठी है मुझ को देखती है उस का हर तार-ए-नज़र आँखों से दाख़िल हो के मेरी खोपड़ी की पुश्त से बाहर निकलता है मिरी तन्हाई सनअत-कार है वो मेरी शिरयानों से लहू छान कर नेज़े बनाती है
Waheed Ahmad
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नश्तर ज़ख़्म लगाता है तो नश्तर से खुलवाता हूँ सिलवाता हूँ फनेर नील उतारता है तो मनके में रिसवाता हूँ खिंचवाता हूँ पानी में गर्मी घोलता है तो पानी का ठंडा प्याला मँगवाता हूँ जब शब-ए-ज़िंदा-दारी में मय चढ़ती है तो सुब्ह सुबूही की सीढ़ी लगवाता हूँ औरत चरका देती है तो औरत को बुलवाता हूँ दिखलाता हूँ इक आदत के घाव पे दूसरी आदत बाँधा करता हूँ मैं औरत के ज़ख़्म के ऊपर औरत बाँधा करता हूँ
Waheed Ahmad
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