वाए तक़दीर मैं गधा न हुआ हम-नवा कृष्न चंद्र का न हुआ मास्टर की पलक झपकते ही हाज़िरी दे के मैं रवाना हुआ वही आया सवाल पर्चे में एक दिन का भी जो पढ़ा न हुआ खेल भी हम सके न जी भर के खेलने का भी हक़ अदा न हुआ मुद्दतों अपने मास्टर जी से मदरसे में भी सामना न हुआ मैं वो दादा हूँ सब को मार के भी आज तक क़ाबिल-ए-सज़ा न हुआ 'कैफ़' मैदान-ए-शे'र-गोई में कोई 'ग़ालिब' सा दूसरा न हुआ
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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
ZafarAli Memon
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ
Varun Anand
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी हर एक फ़र्द के हमदर्द ग़म-गुसार-ए-वतन सदाक़तों के परस्तार झूट के दुश्मन निज़ाम-ए-अम्न के रूह-ए-रवाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी वो एकता के पुजारी हर एक के भाई वो फ़ख़्र-ए-क़ौम वो इंसानियत के शैदाई ज़मीं पे रह के भी इक आसमाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी कली कली को तबस्सुम का एक ढंग दिया हर एक फूल को अपने लहू का रंग दिया बहार-ए-गुलशन-ए-अम्न-ओ-अमाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी हर एक दिल में जलाया चराग़-ए-आज़ादी है जिन के ख़ून से शादाब बाग़-ए-आज़ादी हमारे मुल्क के वो बाग़बाँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी सुनी न बात तशद्दुद भरे उसूलों की महक लुटाई अहिंसा के नर्म फूलों की ख़ुलूस-ओ-इज्ज़ के इक गुलिस्ताँ थे गाँधी जी वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ थे गाँधी जी
Kaif Ahmad Siddiqui
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अगर तेरे मेदे में है कुछ गिरानी तो लेमू का रस पी ले अदरक का पानी अगर दाँत के दर्द से तू है बेकल तो सरसों का तेल और सेंधा नमक मल थकन से अगर तेरे आ'ज़ा हैं ढीले तो थोड़ा सा तू गुनगुना दूध पी ले गले में ख़राबी है नज़ले के मारे तो नमकीन पानी के कर ले ग़रारे अगर ख़ूँ है कम और बल्ग़म ज़ियादा तो गाजर भी खा और शलजम ज़ियादा जिगर ही के दम से है इंसान जीता जिगर का मरज़ है तो खा ले पपीता अगर ज़ेहन कमज़ोर रहता है अक्सर तो खा शहद के साथ बादाम घिस कर अगर तुझ को एहसास है ज़ोफ़-ए-दिल का तो हर रोज़ ले आँवले का मुरब्बा
Kaif Ahmad Siddiqui
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सारे वतन के राज दुलारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे भारत माँ की आँख के तारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे बुनियादी ता'लीम के बानी हुब्ब-ए-वतन की ज़िंदा कहानी इल्म के दरिया अम्न के धारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे मा'मूली उस्ताद से बढ़ कर बन गए सारे मुल्क के रहबर ग़म से कभी हिम्मत ही न हारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे देख के तेरी जेहद-ए-मुसलसल छट गए ख़ुद ही दुख के बादल फूल बने ग़म के अंगारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे गाँधी जी के राज़ के महरम और जवाहर लाल के हमदम अम्न-ओ-अमाँ के पालन-हारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे आज़ादी के दीप जलाए तू ने वतन से दूर भगाए अहद-ए-ग़ुलामी के अँधियारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे मुश्तरका तहज़ीब के मज़हर इज्ज़-ओ-ख़ुलूस अख़्लाक़ के पैकर सब की उम्मीदों के सहारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर प्यारे तू है वतन का रहबर सच्चा क्यूँ न वतन का बच्चा बच्चा नाम तिरा इज़्ज़त से पुकारे सद्र-ए-हुकूमत ज़ाकिर पियारे
Kaif Ahmad Siddiqui
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सोचता हूँ वक़्त की गर्दन पकड़ कर रेशमी स्कार्फ़ का फंदा लगा कर खींच लूँ और इतनी ज़ोर से चीख़ूँ ज़मीं से आसमाँ तक सिर्फ़ मेरी चीख़ ही का शोर गूँजे वक़्त की मरती हुई आवाज़ कोई सुन न पाए सोचता हूँ वुसअत-ए-आफ़ाक़ में परवाज़ कर के रात की आँखों में तारीकी का पर्दा डाल कर मैं चाँद तारों को चुरा लाऊँ ज़मीं पर और थोड़ी देर बच्चों की तरह ख़ुश हो के खेलूँ खेलने से भी जब अपना दिल न बहले एक पत्थर पर पटख़ कर हर खिलौने को मैं चकना-चूर कर दूँ सोचता हूँ आसमाँ से छीन कर जलते हुए सूरज की थाली एक कश्ती की तरह गहरे समुंदर में चलाऊँ और उस पर सारी दुनिया को बिठा कर ग़र्क़ कर दूँ सोचता हूँ सोचते ही सोचते मैं ख़ुद ही इक दिन सोच के आतिश-कदा में जल न जाऊँ
Kaif Ahmad Siddiqui
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सारी दुनिया में ला-जवाब बनो इंतिख़ाबों का इंतिख़ाब बनो अम्न-ओ-इंसानियत की आब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो तुम हो हिन्दोस्ताँ के मुस्तक़बिल तुम से रौशन हो जादा-ए-मंज़िल आरज़ूओं के माहताब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो कामयाबी की शाह-राहों में मादर-ए-हिन्द की निगाहों में जगमगाते हसीन ख़्वाब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो दूर दुनिया से तीरगी कर दो सारे आलम में रौशनी कर दो इल्म-ओ-हिकमत के आफ़्ताब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिन्द के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो तुम से दुनिया में शांति फैले मुर्दा क़ौमों में ज़िंदगी फैले अपने मक़्सद में कामयाब बनो ऐ गुलिस्तान-ए-हिंद के बच्चो मुस्कुराते हुए गुलाब बनो
Kaif Ahmad Siddiqui
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