nazmKuch Alfaaz

"पैदाइश" बंद कमरा छटपटाता सा अँधेरा और दीवारों से टकराता हुआ मैं!! मुंतज़िर हूँ मुद्दतों से अपनी पैदाइश के दिन का अपनी माँ के पेट से निकला हूँ जब से मैं!! ख़ुद अपने पेट के अंदर पड़ा हूँ

Nida Fazli0 Likes

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"अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है" गुज़रती उम्र ढ़लती जा रही है ज़मीं पाँव निगलती जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है परी आगे निकलती जा रही है सितारे बारी-बारी बुझ रहे हैं हवा मोअत्तर होती जा रही है चमकती जा रही है कोई मछली समुंदर बर्फ़ करती जा रही है मैं अपनी नाव में बेकस पड़ा हूँ उफकती नब्ज़ डूबी जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है अँधेरा ही समुंदर का ख़ुदा है ख़ुदा मछली पकड़ना चाहता है

Ammar Iqbal

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"आसमानी ख़्वाब" ये भी इक नेमतों में नेमत है आदमी ख़्वाब देख सकता है या'नी दुनिया के रंज से थक कर नींद के मख़मली से बिस्तर पर अपनी दुनिया से मीलों दूर कहीं नई दुनिया फरोल सकता है हाँ मगर ख़्वाब हैं कई सारे ख़्वाब झूटे भी ख़्वाब सच्चे भी ख़्वाब बदतर हैं ख़्वाब अच्छे भी कुछ तो हैं ख़्वाब कच्ची नींदों के कुछ हैं गहराइयों में डूबे हुए उन में कुछ हैं फ़ुज़ूल बे-बुनियाद और कुछ क़ीमती हैं हीरों से कुछ में उम्मीद साफ़ दिखती है यार की दीद साफ़ दिखती है कुछ धुँदलकों में डूबे हैं जैसे किसी देरीना इश्क़ के बिल-अक्स लूट जाने का दर्स देते हैं फिर न आने का दर्स देते हैं मैं सुनाता हूँ इक निशानी ख़्वाब ख़्वाब था एक आसमानी ख़्वाब मैं ने देखा कि मर गया हूँ मैं और फिर से उठाया जा चुका हूँ एक मैदान है अदालत का मैं कटहरे में लाया जा चुका हूँ मुज़्तरिब हूँ मगर डरा हुआ सा ख़ौफ़ से जिस्म है मरा हुआ सा सामने ज़िंदगी का ख़ाका है इसी अस्ना में आसमाँ से कहीं एक आवाज़ गूँजती है वहाँ ये फ़ुलाँ है न और इब्न-ए-फ़ुलाँ इस से पूछो कहाँ से आया है कौन सी चीज़ साथ लाया है मैं ने रोते में गिड़गिड़ाते में इतना सा कह दिया कि मेरे रब तू नहीं था तो मैं ने दुनिया में तेरे बंदों से बस मुहब्बत की फिर से आवाज़ गूँजती है वहाँ मेरा बंदा है ये जो इब्न-ए-फ़ुलाँ इस से कह दो कि उस को बख़्श दिया

Dharmesh bashar

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"नज़्म क्या है" शा'इरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़ल उर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटल नज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भी ये कभी नस्र है और मुअर्रा कभी नज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँ और आज़ाद में भी है इस का निशाँ नज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़ इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़ नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र है वज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर है वज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुए नसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगे वज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तो इस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहो मसनवी हो क़सीदा हो या मर्सिया नज़्म का मिलता है बच्चो हम को पता नज़्म में सिलसिला है ख़यालात का एक दरिया सा है देखो जज़्बात का वो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोई ये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद की वो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनो दोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो 'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगह हैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशह नज़्म में जो कहानी कही जाएगी शौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगी नज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखीं जो निहायत ही मशहूर साबित हुईं करता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआ नज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा

Amjad Husain Hafiz Karnataki

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जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है वो एक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है उस को छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाक़िफ है बल्कि हर एक रंग के शजरे तक से वाक़िफ है हम ने जिन फूलों को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खेंचती है, सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है सिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती है हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ हैं हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैं मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कालेज आ जाती है

Tehzeeb Hafi

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"तन्हाई है, तन्हाई है, तन्हाई है!" गुल है, गुलाब हैं, हर तरफ़ बहार है ख़िज़ाँ में भी रंगत आई है ना जाने फिर भी क्यो मायूसी छाई है तन्हाई है, तन्हाई है, तन्हाई है उन की याद आना जैसे साँस लेना है ये बात जानलेवा है उन की तस्वीर कुछ ऐसी बसी है हम ने उन्हें बंद आँखों से पहचान लेना है यादों ने उन की हमारी बेक़रारी और बढ़ाई है तन्हाई है, तन्हाई है, तन्हाई है यादों में उन की हम रोए जा रहे हैं बेवजह पलकें भिगोए जा रहे हैं जो कभी हमारे थे ही नहीं हम उन के हुए जा रहे हैं क्या करें, अपनी मौत हमनें ख़ुद बुलाई है तन्हाई है, तन्हाई है, तन्हाई है

Prit

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"बुझ गए नील-गगन" अब कहीं कोई नहीं जल गए सारे फ़रिश्तों के बदन बुझ गए नील-गगन टूटता चाँद बिखरता सूरज कोई नेकी न बदी अब कहीं कोई नहीं आग के शो'ले बढ़े आसमानों का ख़ुदा डर के ज़मीं पर उतरा चार छे गाम चला टूट गया आदमी अपनी ही दीवारों से पत्थर ले कर फिर गुफाओं की तरफ़ लौट गया अब कहीं कोई नहीं

Nida Fazli

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और रास्ता चल रहा है पोस्टर में वो जो लड़की हंस रही है नौज़वां तन्हाइयों को डस रही है आ समाँ सिर पर है, पैरों में ज़मीं है कोई लाठी है न बम है क्या ये कम है? दूर बस्ती के किसी कोने में काली दौलतों ने थोड़ी तोड़ा फोड़ी की है चलते फिरते शहर के बस एक ही रस्ते में ग़म है क्या ये कम है? बाअसर लड़कों ने इस नाज़ुक बदन से खेला फिर उस को तोड़ डाला टूटे-फूटे उस बदल का हाल थाने में रक़म है क्या ये कम है? खेल यूँ हर जगह होता है जो होता रहेगा.... जानवर हंसते रहेंगे आदमी रोता रहेगा ज़िंदा लाशें यूँ ही हर अख़बार में जलती रहेंगी सरहदों पर सरहदों की गोलियां चलती रहेंगी ज़िन्दगी में फिर भी सदियों से जिए जाने का दम है क्या ये कम है...?

Nida Fazli

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"क़ौमी यक-जेहती" वो तवाइफ़ कई मर्दों को पहचानती है शायद इसी लिए दुनिया को ज़ियादा जानती है उस के कमरे में हर मज़हब के भगवान की एक एक तस्वीर लटकी है ये तस्वीरें लीडरों की तक़रीरों की तरह नुमाइशी नहीं उस का दरवाज़ा रात गए तक हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हर मज़हब के आदमी के लिए खुला रहता है ख़ुदा जाने उस के कमरे की सी कुशादगी मस्जिद और मंदिर के आँगनों में कब पैदा होगी

Nida Fazli

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"जेब कटने के ब'अद" मिरे कुर्ते की बूढ़ी जेब से कल तुम्हारी याद!! चुपके से निकल कर सड़क के शोर-ओ-गुल में खो गई है बड़ी बस्ती है किस को फ़िक्र इतनी! कि किस खोली में कब से तीरगी है यहाँ हर एक को अपनी पड़ी है

Nida Fazli

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"इतनी पी जाओ" इतनी पी जाओ कि कमरे की सियह ख़ामोशी इस से पहले कि कोई बात करे तेज़ नोकीले सवालात करे इतनी पी जाओ कि दीवारों के बे-रंग निशान इस से पहले कि कोई रूप भरें माँ बहन भाई को तस्वीर करें मुल्क तक़्सीम करें इस से पहले कि उठें दीवारें ख़ून से माँग भरें तलवारें यूँँ गिरो टूट के बिस्तर पे अँधेरा हो जाए जब खुले आँख सवेरा हो जाए इतनी पी जाओ!

Nida Fazli

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