गर जो दुश्मन भी पिलाए तो पिएँगे हँसकर चाय का हम सेे तो इनकार नहीं होता है
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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी
Ali Zaryoun
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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क्या ख़बर कौन था वो, और मेरा क्या लगता था जिस सेे मिल कर मुझे, हर शख़्स बुरा लगता था
Tehzeeb Hafi
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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मुझ सेे बिछड़ कर भी वो लड़की कितनी ख़ुश ख़ुश रहती है उस लड़की ने मुझ सेे बिछड़ कर मर जाने की ठानी थी
Jaun Elia
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बा'द में बिखरे अगर और भी होगा अफ़सोस मैं न बच्चों को नए ख़्वाब सजाने दूँगा
''Akbar Rizvi"
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जिस को रहती है हर घड़ी तेरी फ़िक्र ऐसे आशिक़ से दिल-लगी करना
''Akbar Rizvi"
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ज़मीर बेच के ये भी अमीर हो जाते अगर ग़रीबों में ख़ुद्दारियाँ नहीं होती
''Akbar Rizvi"
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नुसरत-ए-हक़ देखना आशूर तक ले जाएगी हसरत-ए-दीदार कोह-ए-तूर तक ले जाएगी
''Akbar Rizvi"
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देखलें अपना गिरेबाँ जो ज़माने वाले फिर किसी शख़्स पा उँगली न उठाएगा कोई
''Akbar Rizvi"
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