इक बयाबान रोज़ बनता है इस कदर रूह तक उजड़ते हैं
Related Sher
जिस को ख़ुद मैं ने भी अपनी रूह का इरफ़ाँ समझा था वो तो शायद मेरे प्यासे होंटों की शैतानी थी
Jaun Elia
80 likes
साथ चलते जा रहे हैं पास आ सकते नहीं इक नदी के दो किनारों को मिला सकते नहीं उस की भी मजबूरियाँ हैं मेरी भी मजबूरियाँ रोज़ मिलते हैं मगर घर में बता सकते नहीं
Bashir Badr
85 likes
तू है सूरज तुझे मालूम कहाँ रात का दुख तू किसी रोज़ मेरे घर में उतर शाम के बा'द
Farhat Abbas Shah
47 likes
न शब-ओ-रोज़ ही बदले हैं न हाल अच्छा है किस बरहमन ने कहा था कि ये साल अच्छा है
Ahmad Faraz
52 likes
ख़ुदा ख़ुद को समझते हो तो समझो मगर इक रोज़ मर जाना है तुम को
Shakeel Azmi
52 likes
More from Lokesh Singh
सताती बहुत है बदन की उदासी यहाँ कौन रोता है अपनी ख़ुशी से
Lokesh Singh
0 likes
ज़ीस्त में जब भी कभी घबरा गया आप की मौजूदगी महसूस की
Lokesh Singh
0 likes
पास रख सँभाल कर मेरे अदू इस तीर को रख लिया है बाँध कर मैं ने बदन से पीर को
Lokesh Singh
0 likes
किसी ने छुआ था मुझे ख़्वाब में कल उसी इक छुअन से पिघलने लगे है
Lokesh Singh
0 likes
बसर होगी भला दुनिया में कैसे बदन से ही फ़क़ीरी जा रही है
Lokesh Singh
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Lokesh Singh.
Similar Moods
More moods that pair well with Lokesh Singh's sher.







