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खूब पहचान लो असरार हूँ मैं जिंस ए उल्फ़त का तलबगार हूँ मैं

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तुम ने तो हुक्म-ए-तर्क-ए-तमन्ना सुना दिया किस दिल से आह तर्क-ए-तमन्ना करे कोई

Asrar Ul Haq Majaz

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मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है

Asrar Ul Haq Majaz

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ये क़त्ल-ए-आम और बे-इज़्न क़त्ल-ए-आम क्या कहिए ये बिस्मिल कैसे बिस्मिल हैं जिन्हें क़ातिल नहीं मिलता वहाँ कितनों को तख़्त ओ ताज का अरमाँ है क्या कहिए जहाँ साइल को अक्सर कासा-ए-साइल नहीं मिलता

Asrar Ul Haq Majaz

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कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी कुछ मुझे भी ख़राब होना था

Asrar Ul Haq Majaz

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नहीं हर चंद किसी गुम-शुदा जन्नत की तलाश इक न इक ख़ुल्द-ए-तरब-नाक का अरमाँ है ज़रूर बज़्म-ए-दोशंबा की हसरत तो नहीं है मुझ को मेरी नज़रों में कोई और शबिस्ताँ है ज़रूर

Asrar Ul Haq Majaz

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