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ख़ुद ही मारो ख़ुद ही ख़ुद में मर जाओ ख़ुद की लाशें ख़ुद कंधों पर ढोते नइंँ

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ख़ामोशियाँ ग़ुलाम बनाती हैं शोर को शब इश्क़ के उसूल सिखाती चकोर को दिन भर तो मेरे यार मेरे यार थे बहुत पर शाम को गया जो वो लौटा न भोर को

Anmol Mishra

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धुएँ की चाह में पागल हरी पत्ती जलाते हो समझ पाए न इल्मों को तो तुम पुस्ती जलाते हो बहुत नादान हो तुम भी तुम्हारी हरकतें क्या कम उजाले को मिटाने के लिए बत्ती जलाते हो

Anmol Mishra

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कागज़ों की कश्ती पर दिल के ज़ख़्म ढोते हैं हाथ लगती चीज़ों को हाथ लगते खोते हैं एक दिन अँधेरे ने आके मुझ सेे बोला ये जो उदास रहते नइँ वो उदास होते हैं

Anmol Mishra

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ये हुनर मेरे भी अंदर आ गया है दोस्तों दिल पे लगती बात को बस मुस्कुरा कर टाल दूँ

Anmol Mishra

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फटे मुक़द्दर पे रख के खद्दर हुई सिकंदर उदास नस्लें ज़मीन फाड़ी निचोड़े बादल बनाए सागर उदास नस्लें सुलगते ख़्वाबों की राख ले कर गढ़े थे पुतले जो टेढ़े मेढ़े हँसी के मंतर से जान फूँके उन्हीं के अंदर उदास नस्लें

Anmol Mishra

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