मंज़र बना हुआ हूँ नज़ारे के साथ मैं कितनी नज़र मिलाऊँ सितारे के साथ मैं दरिया से एक घूँट उठाने के वास्ते भागा हूँ कितनी दूर किनारे के साथ मैं
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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मेहरबाँ हम पे हर इक रात हुआ करती थी आँख लगते ही मुलाक़ात हुआ करती थी हिज्र की रात है और आँख में आँसू भी नहीं ऐसे मौसम में तो बरसात हुआ करती थी
Ismail Raaz
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हुआ ही क्या जो वो हमें मिला नहीं बदन ही सिर्फ़ एक रास्ता नहीं ये पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो मेरे लिए ये रास्ता नया नहीं
Azhar Iqbal
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मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है
Ahmad Faraz
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माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
Allama Iqbal
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ज़हीफ़ी इस लिए मुझ को सुहानी लग रही है इसे कमाने में पूरी जवानी लग रही है नतीजा ये है कि बरसों तलाश-ए-ज़ात के बा'द वहाँ खड़ा हूँ जहाँ रेत पानी लग रही है
Khalid Sajjad
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अलमास धरे रह जाते हैं बिकता है तो पत्थर बिकता है अजनास नहीं इस दुनिया में इंसाँ का मुक़द्दर बिकता है 'खालिद सज्जाद' सुनार हूँ मैं इस ग़म को ख़ूब समझता हूँ जब बेटा छुप कर रोता है तब माँ का ज़ेवर बिकता है
Khalid Sajjad
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ज़ब्त का ऐसे इम्तिहान न ले ऐ मेरी जान मेरी जान न ले
Khalid Sajjad
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