न रूई हो तो अपने अश्कों से बाती बनाएँगे बुझा दीया हमारा तो हवा से लड़ भी जाएँगे बनाई रोज़ चौदह साल रंगोली बस इस ख़ातिर न जाने रामजी वनवास से कब लौट आएंँगे
Related Sher
प्यास अगर मेरी बुझा दे तो मैं जानू वरना तू समुंदर है तो होगा मेरे किस काम का है
Rahat Indori
109 likes
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे
Waseem Barelvi
97 likes
चल गया होगा पता ये आप को बे-वफ़ा कहते हैं लड़के आप को इक ज़रा से हुस्न पर इतनी अकड़ तू समझती क्या है अपने आप को
Kushal Dauneria
98 likes
अपने में'यार से नीचे तो मैं आने से रहा शे'र भूखा हूँ मगर घास तो खाने से रहा
Mehshar Afridi
87 likes
अपने सामान को बाँधे हुए इस सोच में हूँ जो कहीं के नहीं रहते वो कहाँ जाते हैं
Jawwad Sheikh
85 likes
More from Krishnakant Kabk
हाँ ये बहुत पाबन्दियों में बाँध कर रखती हमें फिर भी ग़ज़ल के जितनी अच्छी कोई महबूबा नहीं
Krishnakant Kabk
6 likes
मैं कहूँ भी तो कैसे कहूँ अब ग़ज़ल शे'र भी मेरे तन्हा हैं मेरी तरह
Krishnakant Kabk
7 likes
शा'इरी का फ़न तुम भी सीख लो ज़रा हम सेे बस गिटार पर ही लड़की फ़िदा नहीं होती
Krishnakant Kabk
14 likes
सब को ही है तकलीफ़ किसी ना किसी से तो तकलीफ़ को बिल्कुल नहीं तकलीफ़ किसी से
Krishnakant Kabk
5 likes
बुलाया शाम को लेकिन वहाँ मैं सुब्ह जा बैठा सुना था देर से आना उसे अच्छा नहीं लगता
Krishnakant Kabk
31 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Krishnakant Kabk.
Similar Moods
More moods that pair well with Krishnakant Kabk's sher.







