पहली दफ़ा जब जाम होंटों से लगाया तो लगा लब के तिरे होते हुए मय की तलब थी ही नहीं
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आँख में नम तक आ पहुँचा हूँ उस के ग़म तक आ पहुँचा हूँ पहली बार मुहब्बत की थी आख़िरी दम तक आ पहुँचा हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया दरख़्त काट के जब थक गया लकड़हारा तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया
Zubair Ali Tabish
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उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा आसमाँ पे चाँद पूरा था मगर आधा लगा
Iftikhar Naseem
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हिम्मत, ताकत, प्यार, भरोसा जो है सब इनसे ही है कुछ नंबर हैं जिन पर मैं ने अक्सर फोन लगाया है
Pratap Somvanshi
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बेवजह मुझ सेे फिर ख़फ़ा क्यूँ है ये कहानी ही हर दफ़ा क्यूँ है कुछ भी मजबूरी तो नहीं दिखती मैं क्या जानूं वो बे-वफ़ा क्यूँ है
Sandeep Thakur
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ये सोच मत जो जिस्म बिन कपड़ा दिखूँ मैं घूमता ज़ख़्मी फिरूँ हर सू मगर मुझ पर दु'आओं का करम
Zain Aalamgir
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ये क्या कि बाहें है खुली तेरी मगर हूँ मौत का भी यार होने जा रहा
Zain Aalamgir
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ज़िंदा रहा मैं आज भी यारों ग़ज़ब की बात है मज़लूम है बख़्शा गया क्या ख़ूब-सूरत रात है
Zain Aalamgir
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उजलत नहीं करना, किसी मंज़िल लिए मंज़िल कहीं पाने बहुत हो देर ना
Zain Aalamgir
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फिर आँसुओं ने आँख को कर अलविदा फिर अजनबी इस बार अपनों ने किया
Zain Aalamgir
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