ye fann-e-ishq hai aawe use tinat mein jis ki ho tu zahid pir-e-na-baaligh hai be-tah tujh ko kya aawe meer says love is not a skill learned by display of piety; it requires an inborn capacity of the heart. he mocks the zahid who poses as a spiritual guide yet lacks depth and lived experience. the metaphor of a “childish elder” exposes hollow authority: outward age or religiosity without inner maturity cannot grasp عشق.
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बिछड़ गए तो ये दिल उम्र भर लगेगा नहीं लगेगा लगने लगा है मगर लगेगा नहीं नहीं लगेगा उसे देख कर मगर ख़ुश है मैं ख़ुश नहीं हूँ मगर देख कर लगेगा नहीं
Umair Najmi
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तुम्हें हुस्न पर दस्तरस है मोहब्बत वोहब्बत बड़ा जानते हो तो फिर ये बताओ कि तुम उस की आँखों के बारे में क्या जानते हो ये जुग़राफ़िया फ़ल्सफ़ा साईकॉलोजी साइंस रियाज़ी वग़ैरा ये सब जानना भी अहम है मगर उस के घर का पता जानते हो
Tehzeeb Hafi
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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
Ahmad Faraz
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हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए तुम मेरी जान किस गुमान में हो
Jaun Elia
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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा
Tehzeeb Hafi
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शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का
Meer Taqi Meer
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'मीर' के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया
Meer Taqi Meer
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वस्ल में रंग उड़ गया मेरा क्या जुदाई को मुँह दिखाऊँगा
Meer Taqi Meer
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फूल गुल शम्स-ओ-क़मर सारे ही थे पर हमें उन में तुम्हीं भाए बहुत
Meer Taqi Meer
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मेरे संग-ए-मज़ार पर फ़रहाद रख के तेशा कहे है या उस्ताद
Meer Taqi Meer
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