अपने जलने में किसी को नहीं करते हैं शरीक रात हो जाए तो हम शम्अ बुझा देते हैं
Top 20 Sher Series
Shayari of Saba Akbarabadi
Shayari of Saba Akbarabadi ek clean reading flow me, writer aur full-detail links ke saath.
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Series se pehle kuch standout sher padhein.
समझेगा आदमी को वहाँ कौन आदमी बंदा जहाँ ख़ुदा को ख़ुदा मानता नहीं
आप के लब पे और वफ़ा की क़सम क्या क़सम खाई है ख़ुदा की क़सम
ग़लत-फ़हमियों में जवानी गुज़ारी कभी वो न समझे कभी हम न समझे
कब तक नजात पाएँगे वहम ओ यक़ीं से हम उलझे हुए हैं आज भी दुनिया ओ दीं से हम
अच्छा हुआ कि सब दर-ओ-दीवार गिर पड़े अब रौशनी तो है मिरे घर में हवा तो है
आईना कैसा था वो शाम-ए-शकेबाई का सामना कर न सका अपनी ही बीनाई का
ऐसा भी कोई ग़म है जो तुम से नहीं पाया ऐसा भी कोई दर्द है जो दिल में नहीं है
ख़्वाहिशों ने दिल को तस्वीर-ए-तमन्ना कर दिया इक नज़र ने आइने में अक्स गहरा कर दिया
कमाल-ए-ज़ब्त में यूँ अश्क-ए-मुज़्तर टूट कर निकला असीर-ए-ग़म कोई ज़िंदाँ से जैसे छूट कर निकला
कब तक यक़ीन इश्क़ हमें ख़ुद न आएगा कब तक मकाँ का हाल कहेंगे मकीं से हम
अज़ल से आज तक सज्दे किए और ये नहीं सोचा किसी का आस्ताँ क्यूँ है किसी का संग-ए-दर क्या है
गए थे नक़्द-ए-गिराँ-माया-ए-ख़ुलूस के साथ ख़रीद लाए हैं सस्ती अदावतें क्या क्या
जब इश्क़ था तो दिल का उजाला था दहर में कोई चराग़ नूर-बदामाँ नहीं है अब
अपने जलने में किसी को नहीं करते हैं शरीक रात हो जाए तो हम शम्अ बुझा देते हैं
समझेगा आदमी को वहाँ कौन आदमी बंदा जहाँ ख़ुदा को ख़ुदा मानता नहीं
आप के लब पे और वफ़ा की क़सम क्या क़सम खाई है ख़ुदा की क़सम
ग़लत-फ़हमियों में जवानी गुज़ारी कभी वो न समझे कभी हम न समझे
कब तक नजात पाएँगे वहम ओ यक़ीं से हम उलझे हुए हैं आज भी दुनिया ओ दीं से हम
अच्छा हुआ कि सब दर-ओ-दीवार गिर पड़े अब रौशनी तो है मिरे घर में हवा तो है
आईना कैसा था वो शाम-ए-शकेबाई का सामना कर न सका अपनी ही बीनाई का
ऐसा भी कोई ग़म है जो तुम से नहीं पाया ऐसा भी कोई दर्द है जो दिल में नहीं है
ख़्वाहिशों ने दिल को तस्वीर-ए-तमन्ना कर दिया इक नज़र ने आइने में अक्स गहरा कर दिया
कमाल-ए-ज़ब्त में यूँ अश्क-ए-मुज़्तर टूट कर निकला असीर-ए-ग़म कोई ज़िंदाँ से जैसे छूट कर निकला
कब तक यक़ीन इश्क़ हमें ख़ुद न आएगा कब तक मकाँ का हाल कहेंगे मकीं से हम
अज़ल से आज तक सज्दे किए और ये नहीं सोचा किसी का आस्ताँ क्यूँ है किसी का संग-ए-दर क्या है
गए थे नक़्द-ए-गिराँ-माया-ए-ख़ुलूस के साथ ख़रीद लाए हैं सस्ती अदावतें क्या क्या
जब इश्क़ था तो दिल का उजाला था दहर में कोई चराग़ नूर-बदामाँ नहीं है अब
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