नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है कुछ दिन शहर में घू में लेकिन अब घर अच्छा लगता है मिलने-जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं जिस से अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है मेरे आँगन में आए या तेरे सर पर चोट लगे सन्नाटों में बोलने वाला पत्थर अच्छा लगता है चाहत हो या पूजा सब के अपने अपने साँचे हैं जो मौत में ढल जाए वो पैकर अच्छा लगता है हम ने भी सो कर देखा है नए पुराने शहरों में जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है
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ख़ाली बैठे हो तो इक काम मेरा कर दो ना मुझ को अच्छा सा कोई ज़ख़्म अदा कर दो ना ध्यान से पंछियों को देते हो दाना पानी इतने अच्छे हो तो पिंजरे से रिहा कर दो ना जब क़रीब आ ही गए हो तो उदासी कैसी जब दिया दे ही रहे हो तो जला कर दो ना
Zubair Ali Tabish
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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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जाने वालों से राब्ता रखना दोस्तो रस्म-ए-फ़ातिहा रखना घर की ता'मीर चाहे जैसी हो उस में रोने की कुछ जगह रखना मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिए अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना जिस्म में फैलने लगा है शहर अपनी तन्हाइयाँ बचा रखना मिलना-जुलना जहाँ ज़रूरी है मिलने-जुलने का हौसला रखना उम्र करने को है पचास को पार कौन है किस जगह पता रखना
Nida Fazli
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जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे उसे उम्र सारी हमारी लगे उजाला सा है उस के चारों तरफ़ वो नाज़ुक बदन पाँव भारी लगे वो ससुराल से आई है माइके उसे जितना देखो वो प्यारी लगे हसीन सूरतें और भी हैं मगर वो सब सैकड़ों में हज़ारी लगे चलो इस तरह से सजाएँ उसे ये दुनिया हमारी तुम्हारी लगे उसे देखना शेर-गोई का फ़न उसे सोचना दीन-दारी लगे
Nida Fazli
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हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समुंदर मेरा किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से हर जगह ढूँढ़ता फिरता है मुझे घर मेरा एक से हो गए मौसमों के चेहरे सारे मेरी आँखों से कहीं खो गया मंज़र मेरा मुद्दतें बीत गईं ख़्वाब सुहाना देखे जागता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा आइना देख के निकला था मैं घर से बाहर आज तक हाथ में महफ़ूज़ है पत्थर मेरा
Nida Fazli
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दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी रात जंगल में कोई शम्अ' जलाने से रही फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की जगह अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही
Nida Fazli
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यक़ीन चाँद पे सूरज में ए'तिबार भी रख मगर निगाह में थोड़ा सा इंतिज़ार भी रख ख़ुदा के हाथ में मत सौंप सारे कामों को बदलते वक़्त पे कुछ अपना इख़्तियार भी रख ये ही लहू है शहादत ये ही लहू पानी ख़िज़ाँ नसीब सही ज़ेहन में बहार भी रख घरों के ताक़ों में गुल-दस्ते यूँँ नहीं सजते जहाँ हैं फूल वहीं आस-पास ख़ार भी रख पहाड़ गूँजें नदी गाए ये ज़रूरी है सफ़र कहीं का हो दिल में किसी का प्यार भी रख
Nida Fazli
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