rahat na mil saki mujhe mai-khana chhod kar gardish men huun main gardish-e-paimana chhod kar khum men subu men jaam men niyyat lagi rahi mai-khane hi men ham rahe mai-khana chhod kar ankhon ko chhod jaun ilahi main kya karun hatti nahin nazar rukh-e-janana chhod kar aata hai ji men saqi-e-mah-vash pe baar baar lab chuum luun tira lab-e-paimana chhod kar hoti kahan hai dil se juda dil ki aarzu jaata kahan hai shama ko parvana chhod kar do ghunt ne badha diye rindon ke hausle miina o khum pe jhuk pade paimana chhod kar phir bu-e-zulf-e-yar ne aa kar sitam kiya phir chal diya mujhe dil-e-divana chhod kar yaad aai kis ki aankh ki rind uth khade hue paimana tod kar mai o mai-khana chhod kar duniya men afiyat ki jagah hai yahi 'jalil' jaana kahin na gosha-e-mai-khana chhod kar rahat na mil saki mujhe mai-khana chhod kar gardish mein hun main gardish-e-paimana chhod kar khum mein subu mein jam mein niyyat lagi rahi mai-khane hi mein hum rahe mai-khana chhod kar aankhon ko chhod jaun ilahi main kya karun hatti nahin nazar rukh-e-jaanana chhod kar aata hai ji mein saqi-e-mah-wash pe bar bar lab chum lun tera lab-e-paimana chhod kar hoti kahan hai dil se juda dil ki aarzu jata kahan hai shama ko parwana chhod kar do ghunt ne badha diye rindon ke hausle mina o khum pe jhuk pade paimana chhod kar phir bu-e-zulf-e-yar ne aa kar sitam kiya phir chal diya mujhe dil-e-diwana chhod kar yaad aai kis ki aankh ki rind uth khade hue paimana tod kar mai o mai-khana chhod kar duniya mein aafiyat ki jagah hai yahi 'jalil' jaana kahin na gosha-e-mai-khana chhod kar
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है
Jaun Elia
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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न ख़ुशी अच्छी है ऐ दिल न मलाल अच्छा है यार जिस हाल में रक्खे वही हाल अच्छा है दिल-ए-बेताब को पहलू में मचलते क्या देर सुन ले इतना किसी काफ़िर का जमाल अच्छा है बात उल्टी वो समझते हैं जो कुछ कहता हूँ अब के पूछा तो ये कह दूँगा कि हाल अच्छा है सोहबत आईने से बचपन में ख़ुदा ख़ैर करे वो अभी से कहीं समझें न जमाल अच्छा है मुश्तरी दिल का ये कह कह के बनाया उन को चीज़ अनोखी है नई जिंस है माल अच्छा है चश्म ओ दिल जिस के हों मुश्ताक़ वो सूरत अच्छी जिस की ता'रीफ़ हो घर घर वो जमाल अच्छा है यार तक रोज़ पहुँचती है बुराई मेरी रश्क होता है कि मुझ से मिरा हाल अच्छा है अपनी आँखें नज़र आती हैं जो अच्छी उन को जानते हैं मिरे बीमार का हाल अच्छा है बातों बातों में लगा लाए हसीनों को 'जलील' तुम को भी सेहर-बयानी में कमाल अच्छा है
Jaleel Manikpuri
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बहारें लुटा दीं जवानी लुटा दी तुम्हारे लिए ज़िंदगानी लुटा दी सबा ने तो बरसाए गुल फ़स्ल-ए-गुल में घटा ने मय-ए-अरग़वानी लुटा दी अदाओं पे कर दी फ़िदा सारी हस्ती निगाहों पे दुनिया-ए-फ़ानी लुटा दी अजब दौलत-ए-हुस्न पाई थी दिल ने न मानी मिरी इक न मानी लुटा दी न खोना था ग़फ़लत में अहद-ए-जवानी अजब रात थी ये सुहानी लुटा दी न की हुस्न की क़द्र ऐ माह-ए-कामिल फ़क़त रात भर में जवानी लुटा दी हसीनों ने रंगीनी-ए-ख़्वाब-ए-शीरीं सुनी जब हमारी कहानी लुटा दी अजब हौसला हम ने ग़ुंचा का देखा तबस्सुम पे सारी जवानी लुटा दी 'जलील' आप की शा'इरी पर किसी ने निगाहों की जादू-बयानी लुटा दी
Jaleel Manikpuri
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अक्स है आईना-ए-दहर में सूरत मेरी कुछ हक़ीक़त नहीं इतनी है हक़ीक़त मेरी देखता मैं उसे क्यूँँकर कि नक़ाब उठते ही बन के दीवार खड़ी हो गई हैरत मेरी रोज़ वो ख़्वाब में आते हैं गले मिलने को मैं जो सोता हूँ तो जाग उठती है क़िस्मत मेरी सच है एहसान का भी बोझ बहुत होता है चार फूलों से दबी जाती है तुर्बत मेरी आईने से उन्हें कुछ उन्स नहीं बात ये है चाहते हैं कोई देखा करे सूरत मेरी मैं ये समझूँ कोई माशूक़ मिरे हाथ आया मेरे क़ाबू में जो आ जाए तबीअ'त मेरी बू-ए-गेसू ने शगूफ़ा ये नया छोड़ा है निकहत-ए-गुल से उलझती है तबीअ'त मेरी उन से इज़हार-ए-मोहब्बत जो कोई करता है दूर से उस को दिखा देते हैं तुर्बत मेरी जाते जाते वो यही कर गए ताकीद 'जलील' दिल में रखिएगा हिफ़ाज़त से मोहब्बत मेरी
Jaleel Manikpuri
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