तुम पे क्या बीत गई कुछ तो बताओ यारो मैं कोई ग़ैर नहीं हूँ कि छुपाओ यारो इन अँधेरों से निकलने की कोई राह करो ख़ून-ए-दिल से कोई मिशअल ही जलाओ यारो एक भी ख़्वाब न हो जिन में वो आँखें क्या हैं इक न इक ख़्वाब तो आँखों में बसाओ यारो बोझ दुनिया का उठाऊँगा अकेला कब तक हो सके तुम से तो कुछ हाथ बटाओ यारो ज़िंदगी यूँँ तो न बाँहों में चली आएगी ग़म-ए-दौराँ के ज़रा नाज़ उठाओ यारो उम्र-भर क़त्ल हुआ हूँ मैं तुम्हारी ख़ातिर आख़िरी वक़्त तो सूली न चढ़ाओ यारो और कुछ देर तुम्हें देख के जी लूँ ठहरो मेरी बालीं से अभी उठ के न जाओ यारो
Related Ghazal
ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
80 likes
गले तो लगना है उस सेे कहो अभी लग जाए यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए अगर कोई तेरी रफ़्तार मापने निकले दिमाग़ क्या है जहानों की रौशनी लग जाए तू हाथ उठा नहीं सकता तो मेरा हाथ पकड़ तुझे दुआ नहीं लगती तो शा'इरी लग जाए पता करूँँगा अँधेरे में किस से मिलता है और इस अमल में मुझे चाहे आग भी लग जाए हमारे हाथ ही जलते रहेंगे सिगरेट से? कभी तुम्हारे भी कपड़ों पे इस्त्री लग जाए हर एक बात का मतलब निकालने वालों तुम्हारे नाम के आगे न मतलबी लग जाए क्लासरूम हो या हश्र कैसे मुमकिन है हमारे होते तेरी ग़ैर-हाज़िरी लग जाए मैं पिछले बीस बरस से तेरी गिरफ़्त में हूँ के इतने देर में तो कोई आई. जी. लग जाए
Tehzeeb Hafi
124 likes
अश्क ज़ाया' हो रहे थे, देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना, मैं वहाँ रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ, जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पर कितने एहसान है गुज़रे, पर उन आँखों को क्या मेरा दुख ये है, के मेरा हम सेफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र कटा है कहीं, वो मेरे कंधे पे रख लेता था सर, रोता न था प्यार तो पहले भी उस सेे था, मगर इतना नहीं तब में उस को छू तो लेता था, मगर रोता न था गिरियो ज़ारी को भी एक ख़ास मौसम चाहिए, मेरी आँखें देख लो, मैं वक़्त पर रोता न था
Tehzeeb Hafi
85 likes
सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
140 likes
चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
103 likes
More from Jaan Nisar Akhtar
हर एक शख़्स परेशान-ओ-दर-बदर सा लगे ये शहर मुझ को तो यारो कोई भँवर सा लगे अब उस के तर्ज़-ए-तजाहुल को क्या कहे कोई वो बे-ख़बर तो नहीं फिर भी बे-ख़बर सा लगे हर एक ग़म को ख़ुशी की तरह बरतना है ये दौर वो है कि जीना भी इक हुनर सा लगे नशात-ए-सोहबत-ए-रिंदाँ बहुत ग़नीमत है कि लम्हा लम्हा पुर-आशोब-ओ-पुर-ख़तर सा लगे किसे ख़बर है कि दुनिया का हश्र क्या होगा कभी कभी तो मुझे आदमी से डर सा लगे वो तुंद वक़्त की रौ है कि पाँव टिक न सकें हर आदमी कोई उखड़ा हुआ शजर सा लगे जहान-ए-नौ के मुकम्मल सिंगार की ख़ातिर सदी सदी का ज़माना भी मुख़्तसर सा लगे
Jaan Nisar Akhtar
0 likes
ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था मुआ'फ़ कर न सकी मेरी ज़िंदगी मुझ को वो एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था शगुफ़्ता फूल सिमट कर कली बने जैसे कुछ इस कमाल से तू ने बदन चुराया था पता नहीं कि मिरे बा'द उन पे क्या गुज़री मैं चंद ख़्वाब ज़माने में छोड़ आया था
Jaan Nisar Akhtar
2 likes
चौंक चौंक उठती है महलों की फ़ज़ा रात गए कौन देता है ये गलियों में सदा रात गए ये हक़ाएक़ की चटानों से तराशी दुनिया ओढ़ लेती है तिलिस्मों की रिदा रात गए चुभ के रह जाती है सीने में बदन की ख़ुश्बू खोल देता है कोई बंद-ए-क़बा रात गए आओ हम जिस्म की शम्ओं से उजाला कर लें चाँद निकला भी तो निकलेगा ज़रा रात गए तू न अब आए तो क्या आज तलक आती है सीढ़ियों से तिरे क़दमों की सदा रात गए
Jaan Nisar Akhtar
1 likes
ज़मीं होगी किसी क़ातिल का दामाँ हम न कहते थे अकारत जाएगा ख़ून-ए-शहीदाँ हम न कहते थे इलाज-ए-चाक-ए-पैराहन हुआ तो इस तरह होगा सिया जाएगा काँटों से गरेबाँ हम न कहते थे तराने कुछ दिए लफ़्ज़ों में ख़ुद को क़ैद कर लेंगे अजब अंदाज़ से फैलेगा ज़िंदाँ हम न कहते थे कोई इतना न होगा लाश भी ले जा के दफ़ना दे इन्हीं सड़कों पे मर जाएगा इंसाँ हम न कहते थे नज़र लिपटी है शोलों में लहू तपता है आँखों में उठा ही चाहता है कोई तूफ़ाँ हम न कहते थे छलकते जाम में भीगी हुई आँखें उतर आईं सताएगी किसी दिन याद-ए-याराँ हम न कहते थे नई तहज़ीब कैसे लखनऊ को रास आएगी उजड़ जाएगा ये शहर-ए-ग़ज़ालाँ हम न कहते थे
Jaan Nisar Akhtar
0 likes
वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं जो इश्क़ में तालिब नहीं मतलूब रहे हैं तूफ़ान की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं उन को न पुकारो ग़म-ए-दौराँ के लक़ब से जो दर्द किसी नाम से मंसूब रहे हैं हम भी तिरी सूरत के परस्तार हैं लेकिन कुछ और भी चेहरे हमें मर्ग़ूब रहे हैं अल्फ़ाज़ में इज़हार-ए-मोहब्बत के तरीक़े ख़ुद इश्क़ की नज़रों में भी मायूब रहे हैं इस अहद-ए-बसीरत में भी नक़्क़ाद हमारे हर एक बड़े नाम से मरऊब रहे हैं इतना भी न घबराओ नई तर्ज़-ए-अदास हर दौर में बदले हुए उस्लूब रहे हैं
Jaan Nisar Akhtar
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Jaan Nisar Akhtar.
Similar Moods
More moods that pair well with Jaan Nisar Akhtar's ghazal.







