zaban rakhta huun lekin chup khada huun main avazon ke ban men ghir gaya huun mire ghar ka daricha puchhta hai main saara din kahan phirta raha huun mujhe mere siva sab log samjhen main apne aap se kam bolta huun sitaron se hasad ki intiha hai main qabron par charaghhan kar raha huun sambhal kar ab havaon se ulajhna main tujh se pesh-tar bujhne laga huun miri qurbat se kyuun khaif hai duniya samundar huun main khud men gunjta huun mujhe kab tak sametega vo 'mohsin' main andar se bahut tuuta hua huun zaban rakhta hun lekin chup khada hun main aawazon ke ban mein ghir gaya hun mere ghar ka daricha puchhta hai main sara din kahan phirta raha hun mujhe mere siwa sab log samjhen main apne aap se kam bolta hun sitaron se hasad ki intiha hai main qabron par charaghan kar raha hun sambhal kar ab hawaon se ulajhna main tujh se pesh-tar bujhne laga hun meri qurbat se kyun khaif hai duniya samundar hun main khud mein gunjta hun mujhe kab tak sametega wo 'mohsin' main andar se bahut tuta hua hun
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अब के मिली शिकस्त मेरी ओर से मुझे जितवा दिया गया किसी कमज़ोर से मुझे अल्फ़ाज़ ढ़ोने वाली इक आवाज़ था मैं बस फिर उस ने सुनके शे'र किया शोर से मुझे तुझ को न पाके ख़ुश हूँ कि खोने का डर नहीं ग़ुरबत बचा रही है हर इक चोर से मुझे जो शाख़ पर हैं तेरे गुज़रने के बावजूद वो फूल चुभ रहे हैं बहुत ज़ोर से मुझे मैं चाहता था और कुछ ऊँचा हो आसमान क़ुदरत ने पंख सौंप दिए मोर से मुझे मैं ने क़ुबूल कर लिया चुप-चाप वो गुलाब जो शाख़ दे रही थी तेरी ओर से मुझे हल्के से उस ने पूछा किसे दूँ मैं अपना दिल मैं मन ही मन में चीख़ा बहुत ज़ोर से "मुझे"
Charagh Sharma
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दर्द-ए-दिल की दवा नहीं होती इश्क़ में इल्तिजा नहीं होती बना देने से डर जहन्नुम का बंदगी या ख़ुदा नहीं होती ज़िन्दगी बे-वफ़ा ही होती है मौत पर बे-वफ़ा नहीं होती कुछ तो गुज़री है तेरे दिल पे 'शाद' शा'इरी बेवजह नहीं होती
Shaad Imran
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ज़ब्त कर के हँसी को भूल गया मैं तो उस ज़ख़्म ही को भूल गया ज़ात-दर-ज़ात हम-सफ़र रह कर अजनबी अजनबी को भूल गया सुब्ह तक वज्ह-ए-जाँ-कनी थी जो बात मैं उसे शाम ही को भूल गया अहद-ए-वाबस्तगी गुज़ार के मैं वज्ह-ए-वाबस्तगी को भूल गया क्यूँँ न हो नाज़ इस ज़ेहानत पर एक मैं हर किसी को भूल गया सब दलीलें तो मुझ को याद रहीं बहस क्या थी उसी को भूल गया सब से पुर-अम्न वाक़िआ' ये है आदमी आदमी को भूल गया क़हक़हा मारते ही दीवाना हर ग़म-ए-ज़िंदगी को भूल गया ख़्वाब-हा-ख़्वाब जिस को चाहा था रंग-हा-रंग उसी को भूल गया क्या क़यामत हुई अगर इक शख़्स अपनी ख़ुश-क़िस्मती को भूल गया सोच कर उस की ख़ल्वत-अंजुमनी वाँ मैं अपनी कमी को भूल गया सब बुरे मुझ को याद रहते हैं जो भला था उसी को भूल गया उन से वा'दा तो कर लिया लेकिन अपनी कम-फ़ुर्सती को भूल गया बस्तियो अब तो रास्ता दे दो अब तो मैं उस गली को भूल गया उस ने गोया मुझी को याद रखा मैं भी गोया उसी को भूल गया या'नी तुम वो हो वाक़ई? हद है मैं तो सच-मुच सभी को भूल गया आख़िरी बुत ख़ुदा न क्यूँँ ठहरे बुत-शिकन बुत-गरी को भूल गया अब तो हर बात याद रहती है ग़ालिबन मैं किसी को भूल गया उस की ख़ुशियों से जलने वाला 'जौन' अपनी ईज़ा-दही को भूल गया
Jaun Elia
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मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो
Jawwad Sheikh
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हिज्र में ख़ुद को तसल्ली दी, कहा कुछ भी नहीं दिल मगर हँसने लगा, आया बड़ा कुछ भी नहीं हम अगर सब्र में रहते हैं तो क्या कुछ भी नहीं जाने वालो! कभी आ देखो, बचा कुछ भी नहीं बे-दिली यूँँ ही कि रब कोई मसीहा भेजे हम मसीहा से भी कह देंगे, ओ जा! कुछ भी नहीं देखे बिन इश्क़ हुआ, देखे बिना दूर हुए इतना कुछ हो भी गया और हुआ कुछ भी नहीं सस्ते आबिद न बनें, लत को इबादत न कहें आशिक़ी लज़्ज़त-ओ-ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं मैं तेरे बा'द मुसल्ली पे बहुत रोता रहा और कहा, यार ख़ुदा! ख़ैर भला कुछ भी नहीं इश्क़ मरदाना तबीअत नहीं रखता 'अफ़कार'! वरना ये हुस्न-ओ-जमाल और अदा कुछ भी नहीं
Afkar Alvi
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जब से उस ने शहर को छोड़ा हर रस्ता सुनसान हुआ अपना क्या है सारे शहर का इक जैसा नुक़सान हुआ ये दिल ये आसेब की नगरी मस्कन सोचूँ वहमों का सोच रहा हूँ इस नगरी में तू कब से मेहमान हुआ सहरा की मुँह-ज़ोर हवाएँ औरों से मंसूब हुईं मुफ़्त में हम आवारा ठहरे मुफ़्त में घर वीरान हुआ मेरे हाल पे हैरत कैसी दर्द के तन्हा मौसम में पत्थर भी रो पड़ते हैं इंसान तो फिर इंसान हुआ इतनी देर में उजड़े दिल पर कितने महशर बीत गए जितनी देर में तुझ को पा कर खोने का इम्कान हुआ कल तक जिस के गिर्द था रक़्साँ इक अम्बोह सितारों का आज उसी को तन्हा पा कर मैं तो बहुत हैरान हुआ उस के ज़ख़्म छुपा कर रखिए ख़ुद उस शख़्स की नज़रों से उस से कैसा शिकवा कीजे वो तो अभी नादान हुआ जिन अश्कों की फीकी लौ को हम बे-कार समझते थे उन अश्कों से कितना रौशन इक तारीक मकान हुआ यूँँ भी कम-आमेज़ था 'मोहसिन' वो इस शहर के लोगों में लेकिन मेरे सामने आ कर और भी कुछ अंजान हुआ
Mohsin Naqvi
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अब वो तूफ़ाँ है न वो शोर हवाओं जैसा दिल का आलम है तेरे बा'द ख़लाओं जैसा काश दुनिया मेरे एहसास को वापस कर दे ख़ामुशी का वही अंदाज़ सदाओं जैसा पास रह कर भी हमेशा वो बहुत दूर मिला उस का अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल था ख़ुदाओं जैसा कितनी शिद्दत से बहारों को था एहसास-ए-मआ'ल फूल खिल कर भी रहा ज़र्द ख़िज़ाओं जैसा क्या क़यामत है कि दुनिया उसे सरदार कहे जिस का अंदाज़-ए-सुख़न भी हो गदाओं जैसा फिर तेरी याद के मौसम ने जगाए महशर फिर मेरे दिल में उठा शोर हवाओं जैसा बारहा ख़्वाब में पा कर मुझे प्यासा 'मोहसिन' उस की ज़ुल्फ़ों ने किया रक़्स घटाओं जैसा
Mohsin Naqvi
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अज़ाब-ए-दीद में आँखें लहू लहू कर के मैं शर्मसार हुआ तेरी जुस्तुजू कर के खंडर की तह से बुरीदा-बदन सरों के सिवा मिला न कुछ भी ख़ज़ानों की आरज़ू कर के सुना है शहर में ज़ख़्मी दिलों का मेला है चलेंगे हम भी मगर पैरहन रफ़ू कर के मसाफ़त-ए-शब-ए-हिज्राँ के बा'द भेद खुला हवा दुखी है चराग़ों की आबरू कर के ज़मीं की प्यास उसी के लहू को चाट गई वो ख़ुश हुआ था समुंदर को आबजू कर के ये किस ने हम से लहू का ख़िराज फिर माँगा अभी तो सोए थे मक़्तल को सुर्ख़-रू कर के जुलूस-ए-अहल-ए-वफ़ा किस के दर पे पहुँचा है निशान-ए-तौक़-ए-वफ़ा ज़ीनत-ए-गुलू कर के उजाड़ रुत को गुलाबी बनाए रखती है हमारी आँख तिरी दीद से वुज़ू कर के कोई तो हब्स-ए-हवा से ये पूछता 'मोहसिन' मिला है क्या उसे कलियों को बे-नुमू कर के
Mohsin Naqvi
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तिरे बदन से जो छू कर इधर भी आता है मिसाल-ए-रंग वो झोंका नज़र भी आता है तमाम शब जहाँ जलता है इक उदास दिया हवा की राह में इक ऐसा घर भी आता है वो मुझ को टूट के चाहेगा छोड़ जाएगा मुझे ख़बर थी उसे ये हुनर भी आता है उजाड़ बन में उतरता है एक जुगनू भी हवा के साथ कोई हम-सफ़र भी आता है वफ़ा की कौन सी मंज़िल पे उस ने छोड़ा था कि वो तो याद हमें भूल कर भी आता है जहाँ लहू के समुंदर की हद ठहरती है वहीं जज़ीरा-ए-लाल-ओ-गुहर भी आता है चले जो ज़िक्र फ़रिश्तों की पारसाई का तो ज़ेर-ए-बहस मक़ाम-ए-बशर भी आता है अभी सिनाँ को सँभाले रहें अदू मेरे कि उन सफ़ों में कहीं मेरा सर भी आता है कभी कभी मुझे मिलने बुलंदियों से कोई शुआ-ए-सुब्ह की सूरत उतर भी आता है इसी लिए मैं किसी शब न सो सका 'मोहसिन' वो माहताब कभी बाम पर भी आता है
Mohsin Naqvi
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नया है शहर नए आसरे तलाश करूँँ तू खो गया है कहाँ अब तुझे तलाश करूँँ जो दश्त में भी जलाते थे फ़स्ल-ए-गुल के चराग़ मैं शहर में भी वही आबले तलाश करूँँ तू अक्स है तो कभी मेरी चश्म-ए-तर में उतर तिरे लिए मैं कहाँ आइने तलाश करूँँ तुझे हवा से की आवारगी का इल्म कहाँ कभी मैं तुझ को तिरे सामने तलाश करूँँ ग़ज़ल कहूँ कभी सादास ख़त लिखूँ उस को उदास दिल के लिए मश्ग़ले तलाश करूँँ मिरे वजूद से शायद मिले सुराग़ तिरा कभी मैं ख़ुद को तिरे वास्ते तलाश करूँँ मैं चुप रहूँ कभी बे-वज्ह हँस पड़ूँ 'मोहसिन' उसे गँवा के अजब हौसले तलाश करूँँ
Mohsin Naqvi
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