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दादी अम्माँ दादी अम्माँ कितनी सीधी-सादी अम्माँ चाँदी जैसे बालों वाली कितनी अच्छी दादी अम्माँ बातें उन की मिस्री जैसी क़ौल की पक्की दादी अमाँ उजले उजले कपड़े पहने सीधी-सादी दादी अम्माँ दादी अम्माँ दादी अम्माँ कैसी सीधी-सादी अम्माँ रात गए तक परियों वाले क़िस्से हमें सुनाती हैं गीत सुना कर लोरी गा कर मीठी नींद सुलाती हैं आधी रात गए तक जागते रहने की है आदी अम्माँ दादी अम्माँ दादी अम्माँ कैसी सीधी-सादी अम्माँ गुड़िया गुड्डे की पोशाकें हम को सी सी कर देती हैं जितने भी हैं पास हमारे सब संदूक़चे भर देती हैं बन कर फिर बच्चों में बच्चा कर देती है शादी अम्माँ दादी अमाँ दादी अम्माँ कैसी सीधी-सादी अम्माँ अब्बू जब नाराज़ हों हम से वो अब्बू को डाँटती हैं हम बच्चों के हर सुख-दुख को वो हँस हँस के बाँटती हैं जैसे कोई शहर का दादा वैसे घर की दादी अम्माँ दादी अम्माँ दादी अम्माँ कैसी सीधी-सादी अम्माँ

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कितना अर्सा लगा ना-उमीदी के पर्बत से पत्थर हटाते हुए एक बिफरी हुई लहर को राम करते हुए ना-ख़ुदाओं में अब पीछे कितने बचे हैं? रौशनी और अँधेरे की तफ़रीक़ में कितने लोगों ने आँखें गँवा दीं कितनी सदियाँ सफ़र में गुज़ारीं मगर आज फिर उस जगह हैं जहाँ से हमें अपनी माँओं ने रुख़्सत किया था अपने सब से बड़े ख़्वाब को अपनी आँखों के आगे उजड़ते हुए देखने से बुरा कुछ नहीं है तेरी क़ुर्बत में या तुझ से दूरी पे जितनी गुज़ारी तेरी चूड़ियों की क़सम ज़िंदगी दाएरों के सिवा कुछ नहीं है कुहनियों से हमें अपना मुँह ढाँप कर खाँसने को बड़ों ने कहा था तो हम उन पे हँसते थे और सोचते थे कि उन को टिशू-पेपरों की महक से एलर्जी है लेकिन हमें ये पता ही नहीं था कि उन पे वो आफ़ात टूटी हैं जिन का हमें इक सदी बा'द फिर सामना है वबा के दिनों में किसे होश रहता है किस हाथ को छोड़ना है किसे थामना है इक रियाज़ी के उस्ताद ने अपने हाथों में परकार ले कर ये दुनिया नहीं, दायरा खींचना था ख़ैर जो भी हुआ तुम भी पुरखों के नक़्श-ए-क़दम पर चलो और अपनी हिफ़ाज़त करो कुछ महीने तुम्हें अपने तस्में नहीं बाँधने इस से आगे तो तुम पे है तुम अपनी मंज़िल पे पहुँचो या फिर रास्तों में रहो इस से पहले कि तुम अपने महबूब को वेंटीलेटर पे देखो घरों में रहो

Tehzeeb Hafi

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मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??

Shadab Javed

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"वो" वो किताब-ए-हुस्न वो इल्म ओ अदब की तालीबा वो मोहज़्ज़ब वो मुअद्दब वो मुक़द्दस राहिबा किस क़दर पैराया परवर और कितनी सादा-कार किस क़दर संजीदा ओ ख़ामोश कितनी बा-वक़ार गेसू-ए-पुर-ख़म सवाद-ए-दोश तक पहुँचे हुए और कुछ बिखरे हुए उलझे हुए सिमटे हुए रंग में उस के अज़ाब-ए-ख़ीरगी शामिल नहीं कैफ़-ए-एहसासात की अफ़्सुर्दगी शामिल नहीं वो मिरे आते ही उस की नुक्ता-परवर ख़ामुशी जैसे कोई हूर बन जाए यकायक फ़लसफ़ी मुझ पे क्या ख़ुद अपनी फ़ितरत पर भी वो खुलती नहीं ऐसी पुर-असरार लड़की मैं ने देखी ही नहीं दुख़तरान-ए-शहर की होती है जब महफ़िल कहीं वो तआ'रुफ़ के लिए आगे कभी बढ़ती नहीं

Jaun Elia

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"जब पापा पापा कहते थे" जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे जब पापा हम ने कहवाई जाँ फट के गले में है आई तब हँसते गाते फिरते थे अब मारे मारे फिरते हैं न ही कुछ खोने का डर था तब न ही कुछ पाने की इच्छा थी तब मन में जहाँ भी आता था वहीं पे रोया करते थे हम रोने के लिए भी अब हम को जा बुक करवानी पड़ती है जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे स्कूल को हम तुम जाते थे तब ज़ेब में पैसे रहते थे अब हाथ सभी के ख़ाली हैं कैसी यार अब की पढ़ाई है वो पीठ पे बोझ किताबों का और जेब में कंचे रहते थे जब स्कूल से घर आते थे तो चाॅक चुरा कर लाते थे गिल्ली डंडा ले ले कर रोज़ हम गलियों गलियों फिरते थे जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे याद आता है वो दौर हमें दादी के आँचल में छुपते थे मम्मी को झूट बताते थे पापा को झूट बताते थे फिर होती ख़ूब पिटाई थी हम अक्कड़ बक्कड़ करते थे खुट्टल बुट्टल भी करते थे जिस सेे भी लड़ाई होती थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे नाना नानी मौसा मौसी मेहमान जो घर में आते थे उन की ज़ेब से पैसे चुराते थे उन के बैग से चीज़ चुराते थे वो बचपन याद आता है जब बारिश में भीगा करते थे काग़ज़ की नाव बना कर ख़ूब आँगन में हम ने चलाई थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे मम्मी की आँखों में रहते ओझल न कहीं फिर होते थे मम्मी पापा के हिस्से की हर चीज़ हमीं ने खाई थी पापा की गोदी में रहते हम रोज़ दुकानों पर जाते फिर चीज़ वही मिलती हम को उँगली जिस पर भी उठाई थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे वो दिन याद आते हैं हम को जब सबके दिलों में रहते थे बचपन का फ़साना याद आया अब आँख मिरी भर आई है

Prashant Kumar

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हम ज़रूर आऍंगे कितनी नादानियाॅं कितनी फ़नकारियाॅं सब समेटे हुए चल दिए हैं मगर सुन लो शाम-ए-अवध हम मिलें फिर अगर तेरी पगडंडियों पे टहलते हुए देख लेना ये तुझ सेे वा'दा रहा इन दिनों की कहानी को दोहराऍंगे तेरी गलियों में ख़ुशबू पिरोते हुए हम यहाॅं से वहाॅं को निकल जाऍंगे हम ज़रूर आऍंगे हम ज़रूर आऍंगे

zaid alif siddique

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आया है त्यौहार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस मैं लाया हूँ प्यारे तोहफ़े देखो कितने सारे तोहफ़े गुड़िया कैसी आली लाया गुड्डा दाढ़ी वाला लाया जिस के पास हों पैसे ले लो जी चाहे तो वैसे ले लो तोहफ़े पा कर सब बोलेंगे आए यूँँ हर बार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस रंगीले ग़ुब्बारे ले लो गोया चाँद सितारे ले लो चलती फिरती मोटर ले लो ढोल बजाता बंदर ले लो देखो आ कर ख़ूब तमाशा आओ जाने आओ 'पाशा' अगले साल मैं फिर आउँगा जब आएगा यार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस

Haidar Bayabani

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"क्रिसमस" आया है त्यौहार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस मैं लाया हूँ प्यारे तोहफ़े देखो कितने सारे तोहफ़े गुड़िया कैसी आली लाया गुड्डा दाढ़ी वाला लाया जिस के पास हों पैसे ले लो जी चाहे तो वैसे ले लो तोहफ़े पा कर सब बोलेंगे आए यूँँ हर बार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस रंगीले ग़ुब्बारे ले लो गोया चाँद सितारे ले लो चलती फिरती मोटर ले लो ढोल बजाता बंदर ले लो देखो आ कर ख़ूब तमाशा आओ जाने आओ 'पाशा' अगले साल मैं फिर आउँगा जब आएगा यार क्रिसमस बाँटे सब को प्यार क्रिसमस

Haidar Bayabani

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बेलों पर टॉफ़ी खिल जाए चाय कॉफ़ी नल से आए बिस्कुट डाली डाली झूले बच्चा बच्चा जिस को छू ले बगिया होगी कितनी प्यारी लड्डू हों जब क्यारी क्यारी बूँदें टपके बूँदीं बन कर बर्फ़ी फैले घर की छत पर हलवे का बादल घर आए ऐसा काश कभी हो जाए पेड़ों पर पेड़े लग जाएँ जब चाहें हम तोड़ के खाएँ हर जानिब सोहन हलवा हो बालूशाही का जल्वा हो झरना ख़ैर का बहता जाए ख़ूब जलेबी तैरती आए बेरी पर जब मारें पत्थर खील बताशे टपकें दिन भर बच्चा खाए बूढ़ा खाए ऐसा काश कभी हो जाए क़ुलफ़ी का मीनार खड़ा हो हर तारे में केक जुड़ा हो निकलें जब सड़कों पर घर से मोती-चूर के लड्डू बरसे मीठे दूध की बरसातें हों पेठे की सब सौग़ातें हों फ़ालूदे से हौज़ भरा हो लस्सी का दरिया बहता हो बारिश आ कर रस बरसाए ऐसा काश कभी हो जाए नफ़रत हो कड़वी बोली से उल्फ़त हो हर हम-जोली से शीरीं कर दें दुनिया सारी प्यार से भर दें दुनिया सारी दुनिया में हर काम हो शीरीं अव्वल आख़िर नाम हो शीरीं सब से 'हैदर' बोलो मीठा मीठा खा कर बोलो मीठा शीरीनी होंटों पर छाए ऐसा काश अभी हो जाए

Haidar Bayabani

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जनवरी का महीना जो आ कर गया फिर नए साल की इब्तिदाई कर गया फ़रवरी कर रहा है जुदा सर्दियाँ हम उतारेंगे अब ऊन की वर्दियाँ मार्च है साल का तीसरा माह-ए-नौ सब को करता है तल्क़ीन अब ख़ुश रहो माह अप्रैल में इम्तिहाँ आएँगे रात-दिन पढ़ के हम पास हो जाएँगे लो मई आ गया बंद मकतब हुए गर्मियों से परेशान हम सब हुए जून बारिश की लाए ख़बर दोस्तो है फ़लक की तरफ़ हर नज़र दोस्तो है जुलाई के आने के अब सिलसिले खुल गए सारे स्कूल मकतब खुले साल में जब भी माह-ए-अगस्त आ चला अपनी आज़ादियों का बढ़ा क़ाफ़िला जब भी माह-ए-सितंबर जनाब आएगा खेतियों पर ग़ज़ब का शबाब आएगा लाए ख़ुश-हालियाँ देखना अक्टूबर खेत खलियान को हो रही है नज़र कितना पुर-कैफ़ मौसम नवम्बर में है मोतियों जैसी शबनम नवम्बर में है साल रुख़्सत हुआ लो दिसम्बर चला हो शुरूअ' अब नए साल का सिलसिला

Haidar Bayabani

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दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें मेरे सीने तेरे सपने तेरे सुख-दुख मेरे अपने हर आशा को पाएँ साथी दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें ये घर अपना वो घर अपना हीरा अपना कंकर अपना मिल-जुल साथ निभाएँ साथी दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें भाई भाई बन के रहना साथ ही मरना साथ ही जीना मन से मन मिल जाएँ साथी दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें जो साथी भी छूट गया हो बिन-कारन ही रूठ गया हो उस को भी मनवाएँ साथी दीप से दीप जलाएँ साथी हर आँगन उजयारा कर लें हर ज़र्रा मह-पारा कर लें

Haidar Bayabani

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