nazmKuch Alfaaz

लिखाने नाम सच्चे आशिक़ों में जब भी हम निकले इरादों में हमारे जाने कितने पेच-ओ-ख़म निकले ये सोचा था कि घर से भाग कर शादी रचाएँ मगर जब वक़्त आया तो न वो निकलें न हम निकले सुना है रास्ते ही में पुलीस ने धर लिया उन को हमारे दिल पे जब करने को वो मश्क़-ए-सितम निकले दिमाग़ उन का जो देखा और दिल की भी तलाशी ली कई पिस्तौल नख़रों के कई ग़ुस्से के बम निकले झगड़ कर जब कहा बेगम ने हम से घर से जाने को बहुत बे-आबरू हो कर ख़ुद अपने घर से हम निकले जो होता और कोई तो निकल जाता वो ग़ुस्से में मगर हम बा-दिल-ए-नाख़्वासता बा-चश्म-ए-नम निकले हमारा हौसला तो देखिए कि लुंज खाए ही नहीं लौटेंगे अब हम शाम तक खा कर क़सम निकले मगर जब शाम से पहले ही भूके पेट लौट आए वो ता'ना दे के बोलीं आप तो साबित-क़दम निकले ज़माने के सताए हैं जो लोगों को हँसाते हैं कुरेदा जब भी दिल उन का हज़ारों ग़म ही ग़म निकले करम की बात है मेरे गुनह आ'माल-ना में में ये सोचा था बहुत होंगे मगर देखा तो कम निकले बुढ़ापे में भी मेरी 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' आख़िरी ख़्वाहिश हों घर में बीवियाँ इतनी कि हर बीवी पे दम निकले

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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लम्हों में ज़िंदगी का सफ़र यूँँ गुज़र गया साए में जैसे कोई मुसाफ़िर ठहर गया मख़मूर था नशे में ग़म-ए-रोज़गार के होश आ गया तो उम्र का पैमाना भर गया दौलत भी उस के हाथ न आई तमाम-उम्र कुछ नाम ही न अपना ज़माने में कर गया सब उस के ख़ैर-ख़्वाह बुलंदी पे रह गए शोहरत की सीढ़ियों से वो नीचे उतर गया मौका-परस्त आब-ओ-हवा में न जी सका अपनी अना की क़ैद में जाँ से गुज़र गया मौत उस की सारी मुश्किलें आसान कर गई इक बोझ ज़िंदगी का था सर से उतर गया अफ़्सोस कम हुआ मगर हैरत बहुत हुई जब 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' ऐन ज़ईफ़ी में मर गया

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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है यही दस्तूर दुनिया और यही देखा गया फूल से ख़ुश्बू निकलते ही उसे फेंका गया बाग़-ए-हिन्दोस्तान जिन जिन के ख़ून से सींचा गया दार ना-क़दरी पे बिल-आख़िर उन्हें खींचा गया ज़िंदगी में मिल गए कितनों को सरकारी ख़िताब मुफ़्त में इन को ख़रीदा मुफ़्त में बेचा गया मरने वालों को भी हर ए'ज़ाज़ पार्लिया मेंट में एहतिमामन वारिसों के हाथ में सौंपा गया थे रक़म जिन में जिहाद-ओ-जंग-ए-आज़ादी के बाब ताक़-ए-निस्याँ में उन्हीं औराक़ को फेंका गया हिन्द की तारीख़ का बाब दरख़्शाँ पूछिए क्यूँँ सियासी मस्लहत की आग में झोंका गया मुल्क में फ़िरक़ा-परस्तों की हुआ चल ही गई न किसी ने सरज़निश की न उन्हें टोका गया तंग-नज़री बुग़्ज़ और नफ़रत-भरे त्रिशूल को पीठ में इंसानियत की इस तरह घोंपा गया हज़रत-ए-'आज़ाद' को ए'ज़ाज़ भारत-रत्न का 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' उन के पते पर डाक से भेजा गया

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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कमयाब हो गईं जो ज़हानत की रोटियाँ खाने लगे हैं लोग जहालत की रोटियाँ मेहनत से जिन को आर है वो भीक माँग कर दिन-रात तोड़ते हैं सख़ावत की रोटियाँ खा तो रहे हो देखना पछताओगे इक दिन होती नहीं हैं हज़्म अदावत की रोटियाँ लीडर हमारे बाहमी नफ़रत की आग पर जब सेंक चुके गंदी सियासत की रोटियाँ अब आरज़ी फ़त्ह पे नदीदों को देखिए इतरा के खा रहे हैं हिमाक़त की रोटियाँ कुत्तों को खिलाएँगे मोहब्बत की ग़िज़ाएँ मेहमाँ को खिलाते हैं हिक़ारत की रोटियाँ चर्बी घटा लें अपनी सेहत-मंद औरतें परहेज़ में खाती हैं नज़ाकत की रोटियाँ घर के किचन का बुज़ुर्गो रखना ज़रा ख़याल देखो वहाँ पकें न बग़ावत की रोटियाँ अक़्ल-ए-कुल ही जिन्हें छू कर नहीं गई बाँटो न उन में फ़हम-ओ-फ़रासत की रोटियाँ इंसाँ को सताएगी सदा भूक हवस की जब तक न मुयस्सर हों क़नाअ'त की रोटियाँ मेरी सेहत का राज़ बस इतना है 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' खाता हूँ रोज़ तंज़-ओ-ज़राफ़त की रोटियाँ

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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चढ़ती कहीं कहीं से उतरती हैं सीढ़ियाँ जाने कहाँ कहाँ से गुज़रती हैं सीढ़ियाँ यादों के झिलमिलाते सितारे लिए हुए माज़ी की कहकशाँ से उतरती हैं सीढ़ियाँ लेती हैं यूँँ सफ़र में मुसाफ़िर का इम्तिहाँ हमवार रास्तों पे उभरती हैं सीढ़ियाँ करती हैं सर ग़ुरूर का नीचे उतार कर पस्ती का सर बुलंद भी करती हैं सीढ़ियाँ तारीकियों को ओढ़ के सोती हैं रात-भर सूरज की रौशनी में निखरती हैं सीढ़ियाँ हिलती नहीं हिलाए से साबित-क़दम तले महकें अगर क़दम तो बहकती हैं सीढ़ियाँ मिम्बर पे चढ़ के बैठती हैं वाइ'ज़ों के साथ रिंदों से छेड़-छाड़ भी करती हैं सीढ़ियाँ जब कोई हाल पूछने आए न मुद्दतों अंदर से टूट-फूट के मरती हैं सीढ़ियाँ यादों के फूँक फूँक के रखने पड़े क़दम ज़ख़्मों से दिल के जब भी सँवरती हैं सीढ़ियाँ लेती हैं बढ़ के सब के क़दम तो लगा मुझे तन्हाई के अज़ाब से डरती हैं सीढ़ियाँ यूँँ दिल में तेरी बात उतरती है 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' गहरे कुएँ में जैसे उतरती हैं सीढ़ियाँ

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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शा'इरी में न कभी शिकवा-ए-रुस्वाई कर अपने अश'आर की तू ख़ुद ही पज़ीराई कर तेरे वीरान शब-ओ-रोज़ भी रंगीं होंगे बस किसी तरह हसीनों से शनासाई कर जो मरीज़ान-ए-मोहब्बत हैं ग़मों के मारे उन की अशआ'र-ए-ज़राफ़त से मसीहाई कर पेट की आग बुझा मेहनत-ओ-मज़दूरी से वक़्त बच जाए तो मश्क़-ए-सुख़न-आराई कर भूल कर इश्क़ का सौदा न समा ले सर में और मजनूँ की तरह ख़ुद को न सौदाई कर अपनी तन्हाइयाँ यादों से दरख़्शाँ कर ले फिर तसव्वुर में सही अंजुमन-आराई कर आजिज़ी और न आँसू न फ़ुग़ाँ शामिल है कुछ तो फ़रियाद को तू क़ाबिल-ए-शनवाई कर वक़्त के साथ तिरा दिल भी बहल जाएगा ले के काग़ज़-ओ-क़लम क़ाफ़िया-पैमाई कर अपने माशूक़ के ख़्वाबों में चला जा हर शब 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' यूँँ भी इलाज-ए-ग़म-ए-तन्हाई कर और अगर चाहे कि हो 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' शोहरत तेरी यूसुफ़ी गर नहीं मुमकिन तो ज़ुलेख़ाई कर

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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