nazmKuch Alfaaz

"तुम आओगे ना" भले हमारे बीच में हो दूरियाँ सही न मिलने की लाख मजबूरियाँ सही ख़फ़ा हो गई हो ये मौसम की डाली रंगत को तरसे होंठों की लाली जब बिखरी सी लागे मुझे ज़िंदगानी तुम्हें ही पुकारे ये नैनन का पानी जब कोई आस न दिखे तुम्हारे आने की इन सभियों को झुठलाओगे ना? तुम आओगे ना तुम आओगे ना? कुछ ख़ास नहीं है ख़्वाहिश मेरी बस इतनी सी दुआ रहती सदा रहती है कि मेरी नादानियाँ, मेरी बचकानियाँ हमारे बीच की मिठास को खारा न करे बेचैनियों की आफ़त का इशारा न करे न हो कभी भी ख़फ़ा, वफ़ा हम सेे किन्हीं कारणों से जो मैं रूठ जाऊँ मनाओगे ना? तुम आओगे ना?

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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"मुहब्बत मार डालेगी" न चाहा कर किसी को यूँँ कि चाहत मार डालेगी अभी भी वक़्त है सुन लो मुहब्बत मार डालेगी उन्हें अपना बनाने की ये हसरत मार डालेगी अभी भी वक़्त है सुन लो मुहब्बत मार डालेगी उन्हीं के ख़्वाब के पीछे रहोगे रात भर भागे उन्हीं का नाम लोगे बस दिखेगा कुछ नहीं आगे बड़े उलझे से होते हैं ये नाज़ुक प्रेम के धागे करोगे ज़िक्र उन का जब भी दिल में प्यार डालेगी अभी भी वक़्त है सुन लो मुहब्बत मार डालेगी तुम्हारे और हमारे बीच ये तक़रार डालेगी अभी भी वक़्त है सुन लो मुहब्बत मार डालेगी

Ambar

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तुम इक दिन भूल जाओगे हँसाओगे रुलाओगे तुम इक दिन भूल जाओगे हक़ीक़त जानता हूँ मैं तुम इक दिन भूल जाओगे दिखाओगे मुझे सपने ख़ुशी की वादियों वाले जज़ीरों में कहीं तन्हा मुझे तुम छोड़ आओगे हक़ीक़त जानता हूँ मैं तुम इक दिन भूल जाओगे तुम्हें ना देख कर कितनी तड़पती हैं मेरी आँखें तुम्हें खो देने के डर से ये जागी हैं कई रातें उदासी छाई रहती है दिल-ए-बे-ताब में जितनी मुझे लगता नहीं है ये कि तुम भी छटपटाओगे हक़ीक़त जानता हूँ मैं तुम इक दिन भूल जाओगे मुहब्बत कितनी है दिल में यक़ीनन कह न पाऊँगा मगर इतना यक़ीं तो है कि तुम बिन रह न पाऊँगा बड़े वादे किए तुम ने रहूँगा साथ मैं हमदम हक़ीक़त जानता हूँ मैं तुम इक दिन भूल जाओगे हँसाओगे रुलाओगे तुम इक दिन भूल जाओगे हक़ीक़त जानता हूँ मैं तुम इक दिन भूल जाओगे

Ambar

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"सालगिरह" कितने ख़्वाब थे दिल में और कितने अरमाँ सजाए थे हाँ आज वही दिन है जब तुम ज़िन्दगी में आए थे जगाये थे अरमाँ हबाब से ना सही किताब कुछ बाब से अब्र-ए-फ़लक ने भी रुख़ किया था मेरी ओर वीरान पड़ी ज़िन्दगी में तुम घटाएं बन छाए थे हाँ आज वही दिन है जब तुम ज़िन्दगी में आए थे

Ambar

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तुम सेे मिलना चाहे दिल तुम सेे मिलना चाहे दिल बातें करना चाहे दिल चाँद की इच्छा नहीं इस को केवल तुम को चाहे दिल दिल को कैसे समझाऊँ अपने हिस्से नहीं मंज़िल सच्चाई जो भी हो पर प्यार में दूरी है मुश्किल क़ुरबत से भी डर लागे दूरी भी ना चाहे दिल तुम सेे मिलने चाहे दिल बातें करना चाहे दिल

Ambar

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"पैग़ाम" जब भी ये बाद-ए-सबा छू के गुज़रती है मुझे जाने क्यूँ लगता है कि तुम ने पैग़ाम भेजा है आज तक भागता रहता हूँ सदाओं के पीछे के तू कहीं मिल जाएगी भावनाओं के पीछे चश्म-तर हुए बैठे हैं रंगीन घटाओं के पीछे जाने कैसा उभरता दर्द तू ने मेरे नाम भेजा है जब भी ये बाद-ए-सबा छू के गुज़रती है मुझे जाने क्यूँ लगता है कि तुम ने पैग़ाम भेजा है

Ambar

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