हर सुब्ह उठ के इस को मैं हूँ चूमता चाय है जैसे ये कोई सौतन तेरी
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी
Ali Zaryoun
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निगाहें फेर ली घबरा के मैं ने वो तुम से ख़ूब-सूरत लग रही थी
Fahmi Badayuni
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माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
Allama Iqbal
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मेरे आँसू नहीं थम रहे कि वो मुझ सेे जुदा हो गया और तुम कह रहे हो कि छोड़ो अब ऐसा भी क्या हो गया मय-कदों में मेरी लाइनें पढ़ते फिरते हैं लोग मैं ने जो कुछ भी पी कर कहा फ़लसफ़ा हो गया
Tehzeeb Hafi
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तेरे ख़त हम छिपाते भी तो कैसे कि ग़लती इस में तो मेरी नहीं थी अलग कमरा मिला था हम को लेकिन अलग पर कोई अलमारी नहीं थी
RAJAT AWASTHI
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शिकायत मुझे थी इसी बात से कि तू ने कभी भी शिकायत न की यहाँ मैं ही तो था रियासत तेरी तू ने हम पे भी तो हुकूमत न की
RAJAT AWASTHI
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शाख से इक फूल ख़ुद हाथों में मेरे आ गिरा जब कहा उस सेे सजाऊँँगा तुझे उन बालों में
RAJAT AWASTHI
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शाख से इक फूल ख़ुद हाथों में मेरे आ गिरा जब कहा उस सेे सजाउँगा तुझे उन बालों में
RAJAT AWASTHI
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तेरा नाम जब लिख दिया रेत पर समुंदर ने फिर कोई हरकत न की
RAJAT AWASTHI
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