कहानी अपनी जो इक मसख़रा सुनाने लगा कि बैठे लोगों के आँखों में आँसू आने लगा
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हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं
Rahat Indori
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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बात ही कब किसी की मानी है अपनी हठ पूरी कर के छोड़ोगी ये कलाई ये जिस्म और ये कमर तुम सुराही ज़रूर तोड़ोगी
Jaun Elia
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अब इन जले हुए जिस्मों पे ख़ुद ही साया करो तुम्हें कहा था बता कर क़रीब आया करो मैं उस के बा'द महिनों उदास रहता हूँ मज़ाक में भी मुझे हाथ मत लगाया करो
Tehzeeb Hafi
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हो गया ग्यारह का तो दिखने लगीं मजबूरियाँ बीस का होते ही अपनी नौजवानी छोड़ दी
nakul kumar
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तजरबा बस तुम्हें है जीने का हम ने तो ज़िंदगी गँवाई है दस्त के आप ही मुसाफ़िर हो ख़ाक हम ने कहाँ उड़ाई है
Shubham Rai 'shubh'
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अभी जंग जारी है हारा नहीं हूँ कि हथियार अपना उतारा नहीं हूँ ज़मीं है ये मेरी न ललकारो मुझ को सुनामी हूँ मैं कोई धारा नहीं हूँ
Shubham Rai 'shubh'
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बीतता वक़्त इक ख़जाना है क्या नया साल क्या पुराना है
Shubham Rai 'shubh'
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साँस लेने के भी पैसे देने होंगे इस क़दर महँगाई बढ़ती जा रही है
Shubham Rai 'shubh'
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यहाँ दाग़-दार और भी हैं हैं हम तेरे यार और भी हैं बुझा इक चराग़ ख़ुश नहीं हो चराग़-ए-मज़ार और भी हैं
Shubham Rai 'shubh'
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