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करता नहीं कोई कभी इस्लाह दिसंबर आएगा गुज़र जाएगा ये माह दिसंबर एहसान सी करती चली आएगी जनवरी फिर बन के चला जाएगा इक आह दिसंबर

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तुम्हें जब वक़्त मिल जाए चले आना कभी मिलने उभर आई हैं कुछ बातें वही सब बात करनी हैं तिरी आँखों में रह कर फिर नए कुछ दिन उगाने हैं तिरी ज़ुल्फ़ों तले वो कुछ पुरानी रात करनी हैं

nakul kumar

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तन्हा रहता हूँ अक्सर ही हर एक का फिर हो जाता हूँ हो जाता हूँ जैसे दुनिया फिर ख़ुद में ही खो जाता हूँ चुप-चाप पड़ा हूँ कोने में ग़म दर्द जुदाई साथ लिए जब नींद कभी आ जाए तो ख़्वाबों को बिछा सो जाता हूँ

nakul kumar

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ज़िन्दगी अपने लिए ख़ुद मौत बोती जाएगी शाम होते ही घनेरी रात होती जाएगी एक दिन मेरी चिता तैयार कर लेंगे सभी और फिर शाम-ओ-सहर बरसात होती जाएगी

nakul kumar

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मिरे हर लफ़्ज़ में शामिल कहीं कोई कहानी है कहानी भी वही है जो कई सदियों पुरानी है मैं आया हूँ सितारों के परे से दास्ताँ ले कर यही इक दास्ताँ मुझ को सितारों को सुनानी है

nakul kumar

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इन्हीं पिछले दिनों से कुछ मुझे इस बात का ग़म है अगर मैं रो रहा हूँ तो तिरी क्यूँ आँख पुर-नम है तिरी तस्वीर है ये रात है बारिश है बादल भी मगर फिर भी न जाने क्यूँ यहाँ कुछ तो अभी कम है

nakul kumar

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