महफ़िल में कौन आया है सागर लिए हुए इक ख़ास कैफ़ियत का समुंदर लिए हुए
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
Mirza Ghalib
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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इसीलिए तो मैं रोया नहीं बिछड़ते समय तुझे रवाना किया है जुदा नहीं किया है
Ali Zaryoun
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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
Zubair Ali Tabish
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जुदाई इश्क़ का दस्तूर क्यूँँ है हम नहीं समझे मोहब्बत इस क़दर मजबूर क्यूँँ है हम नहीं समझे
Rekhta Pataulvi
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इस भरी काइनात में या रब अपने रहने को एक घर भी नहीं पेड़ के नीचे जो गुज़र जाए ज़िन्दगी इतनी मुख़्तसर भी नहीं
Rekhta Pataulvi
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रेख़्ता हाथ में ज़मीं भी नहीं बात करते हो आसमानों की
Rekhta Pataulvi
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अहल-ए-सरवत ने बिगाड़ा है ज़माने का चलन हम फ़क़ीरों ने ज़माने को मोहब्बत दी है
Rekhta Pataulvi
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मस्त है तारीख़ अपने हाल में इस को मुस्तक़बिल का अंदाज़ा नहीं
Rekhta Pataulvi
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