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तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था

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छुप गए वो साज़-ए-हस्ती छेड़ कर अब तो बस आवाज़ ही आवाज़ है

Asrar Ul Haq Majaz

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ये क़त्ल-ए-आम और बे-इज़्न क़त्ल-ए-आम क्या कहिए ये बिस्मिल कैसे बिस्मिल हैं जिन्हें क़ातिल नहीं मिलता वहाँ कितनों को तख़्त ओ ताज का अरमाँ है क्या कहिए जहाँ साइल को अक्सर कासा-ए-साइल नहीं मिलता

Asrar Ul Haq Majaz

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नहीं हर चंद किसी गुम-शुदा जन्नत की तलाश इक न इक ख़ुल्द-ए-तरब-नाक का अरमाँ है ज़रूर बज़्म-ए-दोशंबा की हसरत तो नहीं है मुझ को मेरी नज़रों में कोई और शबिस्ताँ है ज़रूर

Asrar Ul Haq Majaz

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कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी कुछ मुझे भी ख़राब होना था

Asrar Ul Haq Majaz

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मिरी वफ़ा का तिरा लुत्फ़ भी जवाब नहीं मिरे शबाब की क़ीमत तिरा शबाब नहीं

Asrar Ul Haq Majaz

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