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तुम्हारे हुस्न की ता'रीफ़ लिखने बैठूँ अगर क़सम ख़ुदा की हज़ारों बरस भी कम होंगे

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ज़ुल्म मज़लूमों पे ढाना छोड़ दो हक़ यतीमों का दबाना छोड़ दो ये नहीं कर सकते तो बेहतर है ये सर को सज्दे में झुकाना छोड़ दो

Shajar Abbas

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ज़ुल्म की मिल के क़मर ऐसे करेंगे ख़म सब दूर हो जाएँगे ये अपने वतन से ग़म सब ख़्वाब अज्दाद ने जो देखा है इक दिन उस की देखना ख़ून से ता'बीर लिखेंगे हम सब

Shajar Abbas

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उसे कहो कि मेरे ख़्वाब में चला आए उसे कहो कि मुझे नींद आने वाली है

Shajar Abbas

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ये क्यूँ ज़रदार सारे देख कर करते नहीं हैं ग़म किसी के चश्म क्यूँ ये देख कर होते नहीं हैं नम ज़माना हो गया हम को जवानी ढलने वाली है लिबास-ए-मुफ़्लिसी बचपन से ओढ़े फिर रहे हैं हम

Shajar Abbas

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ये मुहब्बत मेरा असासा है मुझ सेे मत छीन इस असासे को

Shajar Abbas

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