तुम्हारी आँखों की तौहीन है ज़रा सोचो तुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है
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Shayari on Eyes
Shayari on Eyes ek clean reading flow me, writer aur full-detail links ke saath.
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तेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं हाँ मुझी को ख़राब होना था
इक हसीं आँख के इशारे पर क़ाफ़िले राह भूल जाते हैं
उस की आँखों को ग़ौर से देखो मंदिरों में चराग़ जलते हैं
लड़ने को दिल जो चाहे तो आँखें लड़ाइए हो जंग भी अगर तो मज़ेदार जंग हो
पैमाना कहे है कोई मय-ख़ाना कहे है दुनिया तिरी आँखों को भी क्या क्या न कहे है
उन रस भरी आँखों में हया खेल रही है दो ज़हर के प्यालों में क़ज़ा खेल रही है
कैफ़िय्यत-ए-चश्म उस की मुझे याद है 'सौदा' साग़र को मिरे हाथ से लीजो कि चला मैं
उस की आँखें हैं कि इक डूबने वाला इंसाँ दूसरे डूबने वाले को पुकारे जैसे
दिलों का ज़िक्र ही क्या है मिलें मिलें न मिलें नज़र मिलाओ नज़र से नज़र की बात करो
कहीं न उन की नज़र से नज़र किसी की लड़े वो इस लिहाज़ से आँखें झुकाए बैठे हैं
इधर उधर मिरी आँखें तुझे पुकारती हैं मिरी निगाह नहीं है ज़बान है गोया
जब तिरे नैन मुस्कुराते हैं ज़ीस्त के रंज भूल जाते हैं
हर एक आँख में होती है मुंतज़िर कोई आँख हर एक दिल में कहीं कुछ जगह निकलती है
तुम्हारी आँखों की तौहीन है ज़रा सोचो तुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है
तेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं हाँ मुझी को ख़राब होना था
जो उन मासूम आँखों ने दिए थे वो धोके आज तक मैं खा रहा हूँ
यह शेर मासूमियत और धोखे के टकराव पर टिका है। प्रिय की ‘मासूम’ आँखें बाहर से सच्ची लगती हैं, पर वही आकर्षण प्रेमी को भटका देता है। वक्त बीत गया, फिर भी उस भ्रम का असर खत्म नहीं हुआ। भाव में प्रेम के साथ पछतावा और लंबे समय तक रहने वाली पीड़ा है।
इक हसीं आँख के इशारे पर क़ाफ़िले राह भूल जाते हैं
आँख रहज़न नहीं तो फिर क्या है लूट लेती है क़ाफ़िला दिल का
लड़ने को दिल जो चाहे तो आँखें लड़ाइए हो जंग भी अगर तो मज़ेदार जंग हो
जब तिरे नैन मुस्कुराते हैं ज़ीस्त के रंज भूल जाते हैं
आँख से आँख मिलाना तो सुख़न मत करना टोक देने से कहानी का मज़ा जाता है
कैफ़िय्यत-ए-चश्म उस की मुझे याद है 'सौदा' साग़र को मिरे हाथ से लीजो कि चला मैं
आँखें न जीने देंगी तिरी बे-वफ़ा मुझे क्यूँ खिड़कियों से झाँक रही है क़ज़ा मुझे
दिलों का ज़िक्र ही क्या है मिलें मिलें न मिलें नज़र मिलाओ नज़र से नज़र की बात करो
हम मोहब्बत का सबक़ भूल गए तेरी आँखों ने पढ़ाया क्या है
इधर उधर मिरी आँखें तुझे पुकारती हैं मिरी निगाह नहीं है ज़बान है गोया
हर एक आँख में होती है मुंतज़िर कोई आँख हर एक दिल में कहीं कुछ जगह निकलती है
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Shayari on Eyes FAQs
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