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कुछ कहने का वक़्त नहीं ये कुछ न कहो ख़ामोश रहो ऐ लोगों ख़ामोश रहो हाँ ऐ लोगों ख़ामोश रहो सच अच्छा पर उस के जिलौ में ज़हर का है इक प्याला भी पागल हो क्यूँँ नाहक़ को सुक़रात बनो ख़ामोश रहो उन का ये कहना सूरज ही धरती के फेरे करता है सर-आँखों पर सूरज ही को घूमने दो ख़ामोश रहो महबस में कुछ हब्स है और ज़ंजीर का आहन चुभता है फिर सोचो हाँ फिर सोचो हाँ फिर सोचो ख़ामोश रहो गर्म आँसू और ठंडी आहें मन में क्या क्या मौसम हैं इस बगिया के भेद न खोलो सैर करो ख़ामोश रहो आँखें मूँद किनारे बैठो मन के रक्खो बंद किवाड़ 'इंशा'-जी लो धागा लो और लब सी लो ख़ामोश रहो

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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और तो कोई बस न चलेगा हिज्र के दर्द के मारों का सुब्ह का होना दूभर कर दें रस्ता रोक सितारों का झूटे सिक्कों में भी उठा देते हैं ये अक्सर सच्चा माल शक्लें देख के सौदे करना काम है इन बंजारों का अपनी ज़बाँ से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग तुम से तो इतना हो सकता है पूछो हाल बेचारों का जिस जिप्सी का ज़िक्र है तुम से दिल को उसी की खोज रही यूँँ तो हमारे शहर में अक्सर मेला लगा निगारों का एक ज़रा सी बात थी जिस का चर्चा पहुँचा गली गली हम गुमनामों ने फिर भी एहसान न माना यारों का दर्द का कहना चीख़ ही उठो दिल का कहना वज़्अ'' निभाओ सब कुछ सहना चुप चुप रहना काम है इज़्ज़त-दारों का 'इंशा' जी अब अजनबियों में चैन से बाक़ी उम्र कटे जिन की ख़ातिर बस्ती छोड़ी नाम न लो उन प्यारों का

Ibn E Insha

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रात के ख़्वाब सुनाएँ किस को रात के ख़्वाब सुहाने थे धुँदले धुँदले चेहरे थे पर सब जाने-पहचाने थे ज़िद्दी वहशी अल्हड़ चंचल मीठे लोग रसीले लोग होंट उन के ग़ज़लों के मिसरे आँखों में अफ़्साने थे वहशत का उनवान हमारी उन में से जो नार बनी देखेंगे तो लोग कहेंगे 'इंशा'-जी दीवाने थे ये लड़की तो इन गलियों में रोज़ ही घूमा करती थी इस से उन को मिलना था तो इस के लाख बहाने थे हम को सारी रात जगाया जलते बुझते तारों ने हम क्यूँँ उन के दर पर उतरे कितने और ठिकाने थे

Ibn E Insha

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सुनते हैं फिर छुप छुप उन के घर में आते जाते हो 'इंशा' साहब नाहक़ जी को वहशत में उलझाते हो दिल की बात छुपानी मुश्किल लेकिन ख़ूब छुपाते हो बन में दाना शहर के अंदर दीवाने कहलाते हो बेकल बेकल रहते हो पर महफ़िल के आदाब के साथ आँख चुरा कर देख भी लेते भोले भी बन जाते हो पीत में ऐसे लाख जतन हैं लेकिन इक दिन सब नाकाम आप जहाँ में रुस्वा होगे वाज़ हमें फ़रमाते हो हम से नाम जुनूँ का क़ाएम हम से दश्त की आबादी हम से दर्द का शिकवा करते हम को ज़ख़्म दिखाते हो

Ibn E Insha

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शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती या हमीं को ख़बर नहीं होती हम ने सब दुख जहाँ के देखे हैं बेकली इस क़दर नहीं होती नाला यूँ ना-रसा नहीं रहता आह यूँ बे-असर नहीं होती चाँद है कहकशाॅं है तारे हैं कोई शय नामा-बर नहीं होती दोस्तो इश्क़ है ख़ता लेकिन क्या ख़ता दर-गुज़र नहीं होती रात आ कर गुज़र भी जाती है इक हमारी सहर नहीं होती बे-क़रारी सही नहीं जाती ज़िंदगी मुख़्तसर नहीं होती एक दिन देखने को आ जाते ये हवस उम्र भर नहीं होती हुस्न सब को ख़ुदा नहीं देता हर किसी की नज़र नहीं होती

Ibn E Insha

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दिल सी चीज़ के गाहक होंगे दो या एक हज़ार के बीच 'इंशा' जी क्या माल लिए बैठे हो तुम बाज़ार के बीच पीना-पिलाना ऐन गुनह है जी का लगाना ऐन हवस आप की बातें सब सच्ची हैं लेकिन भरी बहार के बीच ऐ सख़ियो ऐ ख़ुश-नज़रो यक गूना करम ख़ैरात करो नारा-ज़नाँ कुछ लोग फिरें हैं सुब्ह से शहर-ए-निगार के बीच ख़ार-ओ-ख़स-ओ-ख़ाशाक तो जानें एक तुझी को ख़बर न मिले ऐ गुल-ए-ख़ूबी हम तो अबस बदनाम हुए गुलज़ार के बीच मिन्नत-ए-क़ासिद कौन उठाए शिकवा-ए-दरबाँ कौन करे नामा-ए-शौक़ ग़ज़ल की सूरत छपने को दो अख़बार के बीच

Ibn E Insha

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