ghazalKuch Alfaaz

ये चुपके चुपके न थमने वाली हँसी तो देखो वो साथ है तो ज़रा हमारी ख़ुशी तो देखो बहुत हसीं रात है मगर तुम तो सो रहे हो निकल के कमरे से इक नज़र चाँदनी तो देखो जगह जगह सील के ये धब्बे ये सर्द बिस्तर हमारे कमरे से धूप की बे-रुख़ी तो देखो दमक रहा हूँ अभी तलक उस के ध्यान से मैं बुझे हुए इक ख़याल की रौशनी तो देखो ये आख़िरी वक़्त और ये बे-हिसी जहाँ की अरे मिरा सर्द हाथ छू कर कोई तो देखो अभी बहुत रंग हैं जो तुम ने नहीं छुए हैं कभी यहाँ आ के गाँव की ज़िंदगी तो देखो

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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अपनी आँखों में भर कर ले जाने हैं मुझ को उस के आँसू काम में लाने है देखो हम कोई वहशी नइँ दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नइँ लगवाने हैं हम तुम इक दूजे की सीढ़ी है जानाँ बाक़ी दुनिया तो साँपों के ख़ाने हैं पाक़ीज़ा चीज़ों को पाक़ीज़ा लिखो मत लिक्खो उस की आँखें मय-ख़ाने हैं

Varun Anand

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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गुज़र रहा है वो लम्हा तो याद आया है उस एक पल से कभी कितना ख़ौफ़ खाया है उसी निगाह ने आँखों को कर दिया पत्थर उसी निगाह में सब कुछ नज़र भी आया है ये तंज़ यूँँ भी है इक इम्तिहान मेरे लिए तिरे लबों से कोई और मुस्कुराया है बहे रक़ीब के आँसू भी मेरे गालों पर ये सानेहा भी मोहब्बत में पेश आया है ये कोई और है तेरी तरफ़ सरकता हुआ अँधेरा होते ही जो मुझ में आ समाया है हमारे इश्क़ से मरऊब इस क़दर भी न हो ये ख़ूँ तो एक अदाकार ने बहाएा है यहाँ तो रेत है पत्थर हैं और कुछ भी नहीं वो क्या दिखाने मुझे इतनी दूर लाया है बहुत से बोझ हैं दिल पर ये कोई ऐसा नहीं ये दुख किसी ने हमारे लिए उठाया है

Shariq Kaifi

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सूना आँगन नींद में ऐसे चौंक उठा है सोते में भी जैसे कोई सिसकी लेता है घर में तो इस माहौल का मैं आदी हूँ लेकिन बाज़ारों की वीरानी से दम घुटता है मुद्दत से मैं सोच रहा था अब समझा हूँ जेब और आँख के ख़ाली-पन में क्या रिश्ता है इतने लोग मुझे रुख़्सत करने आए हैं घर वापस जाना भी तमाशा सा लगता है लोग तो अपनी जानिब से कुछ जोड़ ही लेंगे इतनी अधूरी बातें हैं वो क्यूँँ करता है अपनी क्या इन रस्तों के बारे में सोचूँ उन का सफ़र तो मेरी उम्र से भी लम्बा है उस की आँखों से ओझल मत होना 'शारिक़' पीछा करने वाला बहुत तन्हा होता है

Shariq Kaifi

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सामने तेरे हूँ घबराया हुआ बे-ज़बाँ होने पर शरमाया हुआ लाख अब मंज़र हो धुँदलाया हुआ याद है मुझ को नज़र आया हुआ ये भी कहना था बता कर रास्ता मैं वही हूँ तेरा भटकाया हुआ मैं कि इक आसेब इक बे-चैन रूह बे-वुज़ू हाथों का दफ़नाया हुआ आ गया फिर मशवरा देने मुझे ख़ेमा-ए-दुश्मन का समझाया हुआ फिर वो मंज़िल लुत्फ़ क्या देती मुझे मैं वहाँ पहुँचा था झुँझलाया हुआ तेरी गलियों से गुज़र आसाँ नहीं आज भी चलता हूँ घबराया हुआ कुछ नया करने का फिर मतलब ही क्या जब तमाशाई है उकताया हुआ कम से कम इस का तो रखता वो लिहाज़ मैं हूँ इक आवाज़ पर आया हुआ मुझ को आसानी से पा सकता है कौन मैं हूँ तेरे दर का ठुकराया हुआ

Shariq Kaifi

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तिरी तरफ़ से तो हाँ मान कर ही चलना है कि सारा खेल इस उम्मीद पर ही चलना है क़दम ठहर ही गए हैं तिरी गली में तो फिर यहाँ से कोई दुआ माँग कर ही चलना है रहे हो साथ तो कुछ वक़्त और दे दो हमें यहाँ से लौट के बस अब तो घर ही चलना है मुख़ालिफ़त पे हवाओं की क्यूँ परेशाँ हों तुम्हारी सम्त अगर उम्‍र भर ही चलना है कोई उमीद नहीं खिड़कियों को बंद करो कि अब तो दश्त-ए-बला का सफ़र ही चलना है ज़रा सा क़ुर्ब मुयस्सर तो आए उस का मुझे कि उस के बा'द ज़बाँ का हुनर ही चलना है

Shariq Kaifi

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एक मुद्दत हुई घर से निकले हुए अपने माहौल में ख़ुद को देखे हुए एक दिन हम अचानक बड़े हो गए खेल में दौड़ कर उस को छूते हुए सब गुज़रते रहे सफ़-ब-सफ़ पास से मेरे सीने पे इक फूल रखते हुए जैसे ये मेज़ मिट्टी का हाथी ये फूल एक कोने में हम भी हैं रक्खे हुए शर्म तो आई लेकिन ख़ुशी भी हुई अपना दुख उस के चेहरे पे पढ़ते हुए बस बहुत हो चुका आइने से गिला देख लेगा कोई ख़ुद से मिलते हुए ज़िंदगी भर रहे हैं अँधेरे में हम रौशनी से परेशान होते हुए

Shariq Kaifi

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