nazmKuch Alfaaz

ख़ुर्शीद वो देखो डूब गया ज़ुल्मत का निशाँ लहराने लगा महताब वो हल्के बादल से चाँदी के वरक़ बरसाने लगा वो साँवले-पन पर मैदाँ के हल्की सी सबाहत दौड़ चली थोड़ा सा उभर कर बादल से वो चाँद जबीं झलकाने लगा लो फिर वो घटाएँ चाक हुईं ज़ुल्मत का क़दम थर्राने लगा बादल में छुपा तो खोल दिए बादल में दरीचे हीरे के गर्दूं पे जो आया तो गर्दूं दरिया की तरह लहराने लगा सिमटी जो घटा तारीकी में चाँदी के सफ़ीने ले के चला सनकी जो हवा तो बादल के गिर्दाब में ग़ोते खाने लगा ग़ुर्फों से जो झाँका गर्दूं के अमवाज की नब्ज़ें तेज़ हुईं हल्क़ों में जो दौड़ा बादल के कोहसार का सर चकराने लगा पर्दा जो उठाया बादल का दरिया पे तबस्सुम दौड़ गया चिलमन जो गिराई बदली की मैदान का दिल घबराने लगा उभरा तो तजल्ली दौड़ गई डूबा तो फ़लक बे-नूर हुआ उलझा तो सियाही दौड़ा दी सुलझा तो ज़िया बरसाने लगे क्या काविश-ए-नूर-ओ-ज़ुल्मत है क्या क़ैद है क्या आज़ादी है इंसाँ की तड़पती फ़ितरत का मफ़्हूम समझ में आने लगा

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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

BR SUDHAKAR

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"अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है" गुज़रती उम्र ढ़लती जा रही है ज़मीं पाँव निगलती जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है परी आगे निकलती जा रही है सितारे बारी-बारी बुझ रहे हैं हवा मोअत्तर होती जा रही है चमकती जा रही है कोई मछली समुंदर बर्फ़ करती जा रही है मैं अपनी नाव में बेकस पड़ा हूँ उफकती नब्ज़ डूबी जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है अँधेरा ही समुंदर का ख़ुदा है ख़ुदा मछली पकड़ना चाहता है

Ammar Iqbal

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"नज़्म क्या है" शा'इरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़ल उर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटल नज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भी ये कभी नस्र है और मुअर्रा कभी नज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँ और आज़ाद में भी है इस का निशाँ नज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़ इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़ नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र है वज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर है वज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुए नसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगे वज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तो इस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहो मसनवी हो क़सीदा हो या मर्सिया नज़्म का मिलता है बच्चो हम को पता नज़्म में सिलसिला है ख़यालात का एक दरिया सा है देखो जज़्बात का वो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोई ये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद की वो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनो दोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो 'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगह हैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशह नज़्म में जो कहानी कही जाएगी शौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगी नज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखीं जो निहायत ही मशहूर साबित हुईं करता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआ नज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा

Amjad Husain Hafiz Karnataki

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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ

Lal Chand Falak

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उस का चेहरा सिंपल सादा सा भोला चेहरा है यार क़सम से वो प्यारा चेहरा है पेड़ नदी ये फूल सभी छोड़ो उस को देखो उस का चेहरा है दुनिया लाख हसीन हो सकती है लेकिन उस का चेहरा चेहरा है देख उसे कह डाला हम ने भी बातें प्यारी हैं प्यारा चेहरा है इक तिल होट पे, गाल के नीचे इक और वो चाँद सा नाक पे नूर लिए दो प्यारी आँखें, और सुर्ख़ से लब प्यार मिलाकर अपना रंगों में हम ने बनाया उस का चेहरा है भोली सूरत पे वो अकड़ देखो ग़लती कर के घुमाया चेहरा है रूठ गई जो हम सेे कभी वो दोस्त सब सेे पहले चुराया चेहरा है जब भी उस को चूमने आए हम होट से पहले आया चेहरा है मुँह से इक वो स्वाद नहीं जाता जबसे उस का चूमा चेहरा है रात का होना उस की आँखें हैं दिन का निकलना उस का चेहरा है दुनिया में है उस के चेहरे से है नूर रौशनी लाया उस का चेहरा है हम जैसे भी दरिया करेंगे पार ! अब जो सहारा उस का चेहरा है हम आबाद रहेंगे ऐसे ही हम पे गर साया वो चेहरा है वो चेहरा है बस वो चेहरा है हम को बस वो चेहरा चेहरा है हम ने चाहा बस वो चेहरा है हम ने माँगा बस वो चेहरा है हम ने देखा भी तो वो चेहरा हम ने सोचा बस वो चेहरा है

BR SUDHAKAR

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अलस्सबाह कि थी काएनात सर-ब-सुजूद फ़लक पे शोर-ए-अज़ाँ था ज़मीं पे बाँग-ए-दुरूद बहार शबनम-आसूदा थी कि रूह-ए-ख़लील फ़रोग़-ए-लाला-ओ-गुल था कि आतिश-ए-नमरूद जला रही थी हवा बज़्म-ए-जाँ में शम-ए-तरब मिटा रही थी सबा लौह-ए-दिल से नक़्श-ए-जुमूद गुलों के रंग में थी शान-ए-ख़ंदा-ए-यूसुफ़ कली के साज़ में था लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-दाऊद हर इक जबीं पे दरख़्शाँ था नय्यर-ए-इक़बाल हर एक फ़र्क़ पे ताबाँ था ताला-ए-मसऊद फ़ज़ा-ए-चर्ख़ में दौड़ी हुई थी रूह-ए-ज़ुहूर बिसात-ए-ख़ाक पे छाया हुआ था रंग-ए-नुमूद हसीन ख़्वाब से चौंके थे रसमसाए हुए मचल रही थी हवाओं में बू-ए-अम्बर-ओ-बूद ये रंग देख कर आया मुझे ख़याल-ए-नमाज़ मिरी नमाज़ कि है शाहिद-ओ-शराब-ओ-सुरूद मिरी नमाज़ कि है नग़मा-ए-हुवल-बाक़ी मिरी नमाज़ कि है नारा-ए-हुवल-मौजूद मिरी नमाज़ कि है इश्क़-ए-नाज़िर-ओ-मंज़ूर मिरी नमाज़ कि है हुब्ब-ए-शाहिद-ओ-मशहूद मिरी नमाज़ कि है एक साज़-ए-ला-फ़ानी मरी नमाज़ कि है एक सोज़-ए-ला-महदूद मिरी नमाज़ कि है दीद रू-ए-नाशुस्ता मिरी नमाज़ कि है तौफ़-ए-हुस्न-ए-ख़्वाब-आलूद मिरी नमाज़ ''नज़र'' शैख़ की नमाज़ ''अल्फ़ाज़'' यहाँ चराग़ वहाँ सिर्फ़ शम-ए-कुश्ता का दूद यहाँ है रिश्ता-ए-अन्फ़ास में तरन्नुम-ए-दोस्त यहाँ लताफ़त-ए-एहसास से ज़ियाँ है न सूद फ़ुग़ाँ कि ''जुम्बिश-ए-आज़ा'' वहाँ असास-ए-नमाज़ ख़ोशा कि लर्ज़िश-ए-दिल है यहाँ क़याम ओ क़ूऊद किसी मक़ाम पे हासिल नहीं क़रार मुझे सहर को हूँ जो बरहमन तो शाम को महमूद ग़रज़ कि आते ही वक़्त-ए-सहर ख़याल-ए-नमाज़ जबीं थी पा-ए-सनम पर ज़बाँ पे ''या-माबूद!'' तमाम राज़-ए-निहाँ खुल गए मिरे दिल पर ज़े-तकिया-गाह-ए-अदम ता-ब-कारगाह-ए-वजूद सर-ए-नियाज़ से ज़ाहिर हुआ तबस्सुम-ए-नाज़ बुतून-ए-ख़ाक से पैदा हुआ दुर-ए-मक़सूद उठा के फिर सर-ए-पुर-शौक़ पा-ए-जानाँ से कहा ये मैं ने कि ऐ सर्व-ए-बोस्वतान-ए-जूद बिया बिया कि तिरा तंग दर कनार कुशेम ज़े-बोसा-मेहर-कुनम बर-लब-ए-शकर-आलूद मिरे लबों को भी दे रुख़्सत-ए-तराना-ए-हम्द हर एक ज़र्रा है इस वक़्त आशना-ए-दुरूद ये सुन के शर्म से कोई जवाब बन न पड़ा झुकी निगाह-ए-जबीं हो गई अरक़-आलूद हया ने बढ़ के पुकारा ये ''काहिशें बे-कार'' नज़र ने झुक के सदा दी ये ''काविशें बे-सूद'' ''दहान-ए-यार कि दरमान-ए-दर्द-ए-'हाफ़िज़' दाश्त फ़ुग़ाँ कि वक़्त-ए-मुरव्वत चे तंग हौसला बूद''

Josh Malihabadi

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फ़िरदौस बनाए हुए सावन के महीने इक गुल-रुख़ ओ नस्रीं-बदन ओ सर्व-ए-सही ने माथे पे इधर काकुल-ए-ज़ोलीदा की लहरें गर्दूं पे उधर अब्र-ए-ख़िरामाँ के सफ़ीने मेंह जितना बरसता था सर-ए-दामन-ए-कोहसार इतने ही ज़मीं अपनी उगलती थी दफ़ीने अल्लाह-रे ये फ़रमान कि इस मस्त हवा में हम मुँह से न बोलेंगे अगर पी न किसी ने वो मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार था जिस के लिए बरसों माँगी थीं दुआएँ मिरे आग़ोश-ए-तही ने गुल-रेज़ थे साहिल के लचकते हुए पौदे गुल-रंग थे तालाब के तर्शे हुए ज़ीने बारिश थी लगातार तो यूँँ गर्द थी मफ़क़ूद जिस तरह मय-ए-नाब से धुल जाते हैं सीने दम भर को भी थमती थीं अगर सर्द हवाएँ आते थे जवानी को पसीने पे पसीने भर दी थी चटानों में भी ग़ुंचों की सी नर्मी इक फ़ित्ना-ए-कौनैन की नाज़ुक-बदनी ने गेती से उबलते थे तमन्ना के सलीक़े गर्दूं से बरसते थे मोहब्बत के क़रीने क्या दिल की तमन्नाओं को मरबूत किया था सब्ज़े पे चमकती हुई सावन की झड़ी ने बदली थी फ़लक पर कि जुनूँ-ख़ेज़ जवानी बूँदें थीं ज़मीं पर कि अँगूठी के नगीने शाख़ों पे परिंदे थे झटकते हुए शहपर नहरों में बतें अपने उभारे हुए सीने इस फ़स्ल में इस दर्जा रहा बे-ख़ुद ओ सरशार मयख़ाने से बाहर मुझे देखा न किसी ने क्या लम्हा-ए-फ़ानी था कि मुड़ कर भी न देखा दी कितनी ही आवाज़ हयात-ए-अबदी ने

Josh Malihabadi

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छट गए जब आप ही ऊदी घटा छाई तो क्या तुर्बत-ए-पामाल के सब्ज़े पे लहर आई तो क्या जब ज़रूरत ही रही बाक़ी न लहन-ओ-रंग की कोयलें कूकीं तो क्या सावन की रुत आई तो क्या हिज्र के आलाम से जब छुट चुकी नब्ज़-ए-नशात अब हवा ने ख़ार-ओ-ख़स में रूह दौड़ाई तो क्या हो चुकी ज़ौक़-ए-तबस्सुम ही से जब बेगानगी अब चमन-अफ़रोज़ फूलों को हँसी आई तो क्या मुड़ चुकी जब मौत के जादे की जानिब ज़िंदगी अब किसी ने आफ़ियत की राह दिखलाई तो क्या हर नफ़स के साथ दिल से जब धुआँ उठने लगा बादलों से छन के अब ठंडी हवा आई तो क्या सामने जब आप के गेसू की लहरें ही नहीं बदलियों ने चर्ख़ पर अब ज़ुल्फ़ बिखराई तो क्या हो चुका पायाब जब बहर-ए-सर-ओ-बर्ग-ए-शबाब अब समुंदर की जवानी बाढ़ पर आई तो क्या ग़ुंचा-ए-अहद-ए-तरब ही मिल चुका अब ख़ाक में ख़ाक-ए-गुलशन अब गुल-ए-तर बन के इतराई तो क्या मिट चुके जब वालिहाना बाँकपन के वलवले आई अब दोशीज़ा-ए-मौसम को अँगड़ाई तो क्या खुल चुका जब परचम-ए-ग़म ज़िंदगी के क़स्र पर अब हवाओं ने कमर पौदों की लचकाई तो क्या आँसुओं में बह गईं जब ख़ून की जौलानियाँ जंगलों की छाँव में बरसात इठलाई तो क्या 'जोश' के पहलू में जब तुम ही मचल सकते नहीं फिर घटा के दामनों में बर्क़ लहराई तो क्या

Josh Malihabadi

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अब सबा कूचा-ए-जानाँ में गुज़रे है कि नहीं तुझ को इस फ़ित्ना-ए-आलम की ख़बर है कि नहीं बुझ गया मेहर का फ़ानूस कि रौशन है अभी अब उन आँखों में लगावट का असर है कि नहीं अब मेरे नाम का पढ़ता है वज़ीफ़ा कोई अब मिरा ज़िक्र-ए-वफ़ा दर्द-ए-सहर है कि नहीं अब भी तकती हैं मिरी राह वो काफ़िर आँखें अब भी दुज़्दीदा नज़र जानिब-ए-दर है कि नहीं छुप के रातों को मिरी याद में रोता है कोई मौजज़न आँख में अब ख़ून-ए-जिगर है कि नहीं हुस्न को पुर्सिश-ए-बीमार का है अब भी ख़याल मेहर की ज़र्रा ख़ाकी पे नज़र है कि नहीं बे-ख़बर मुझ को ज़माने से किया है जिस ने कुछ उसे मेरी तबाही की ख़बर है कि नहीं खाए जाता है मुझे दर्द-ए-ग़रीब-उल-वतनी दिल पर इस जान-ए-वतन के भी असर है कि नहीं 'जोश' ख़ामोश भी हो पूछ रहा है क्या क्या कुछ तुझे ताड़ने वालों की ख़बर है कि नहीं

Josh Malihabadi

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फिर दिल में दर्द सिलसिला-ए-जुम्बा है क्या करूँँ फिर अश्क गर्म-ए-दावत-ए-मिज़्गाँ है क्या करूँँ फिर चाक चाक सीना है आवाज़ दूँ किसे फिर तार तार जैब-ओ-गरेबाँ है क्या करूँँ फिर इत्तिसाल-ए-गर्दन-ओ-ख़ंजर है क्या कहूँ फिर इख़्तिलात-ए-ज़ख़्म-ओ-नमक-दाँ है क्या करूँँ फिर इक गिरह हरीफ़-ए-नफ़स है किसे बताऊँ फिर इक खटक रफ़ीक़-ए-रग-ए-जाँ है क्या करूँँ सीने में एक दशना सा लेता है करवटें रग रग में एक आग सी ग़लताँ है क्या करूँँ जिस चीज़ पर मदार था दरमान-ए-ज़ीस्त का वो शय फिर आज दर्द का उनवाँ है क्या करूँँ फिर सर पर अब्र-ए-दौर-ए-जुनूँ है घिरा हुआ फिर दिल में बू-ए-ज़ुल्फ़ परेशाँ है क्या करूँँ फिर इश्क़-ए-ना-सुबूर का परतव है रूह पर फिर दिल हुज़ूर-ए-अक़्ल पशेमाँ है क्या करूँँ बीते दिनों की याद पर अफ़्शाँ है क्या करूँँ रातों की नम हवाओं में तारों की छाँव में बीते दिनों की याद पर-अफ़्शाँ है क्या करूँँ जिस चाँदनी को खोए हुए मुद्दतें हुईं फिर ज़ेहन के उफ़ुक़ से नुमायाँ है क्या करूँँ तक़दीर ने कभी जो निकाला था इक जुलूस फिर जादा-ए-नफ़स पे ख़िरामाँ है क्या करूँँ वो ग़म कि दे चुका हूँ जिसे बार-हा शिकस्त फिर दिल से 'जोश' दस्त-ओ-गरेबाँ है क्या करूँँ

Josh Malihabadi

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