nazmKuch Alfaaz

लोग कहते हैं कि ये आलम है इक आलम नया साज़-ए-नौ हाथों में है पैदा है ज़ेर-ओ-बम नया लोग कहते हैं कि अब क़िस्मत हमारे साथ है लोग कहते हैं कि अब अज़्मत हमारे साथ है लोग कहते हैं कि अब जिद्दत हमारे साथ है लोग कहते हैं मगर कहने से कुछ होता नहीं ये जो आलम है निगाहों में नहीं आलम नया हाँ मगर हर इक नफ़स में है पयाम-ए-ग़म नया जिस के चर्चे हैं जहाँ में वो मसर्रत है कहाँ लोग जिस अज़्मत पे नाज़ाँ हैं वो अज़्मत है कहाँ कौन इन फूलों पे क़ाबिज़ है वो राहत है कहाँ ढूँडते हैं दर-ब-दर अंजाम-ए-मेहनत है कहाँ ये जो आलम है निगाहों में नहीं आलम नया ज़ख़्म गहरे हैं बहुत लाओ कोई मरहम नया ग़म के मारो ढूँढ़ लो इक चारा-साज़-ए-ग़म नया मेरे दामन में नहीं हैं तेरे दामन में नहीं शाख़-ए-गुलशन से जो गुल फूटे वो गुलशन में नहीं

Daud Ghazi0 Likes

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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है

Sandeep Thakur

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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चार सू इक उदास मंज़र है ज़ीस्त है जैसे एक वीराना जाने क्यूँ फट रहा है आज दिमाग़ हो न जाऊँ कहीं मैं दीवाना दोस्त कहते हैं सैर कर आएँ मौज कर आएँ दिल को बहलाएँ कोई दिलबर न दिल-नशीं कोई कोई गुल-रू न मह-जबीं कोई जी मचल जाए जिस से मिलने को हाए इस दहर में नहीं कोई चाँद तारों की रौशनी बे-सूद सैर-ए-दरिया की बात भी बे-सूद गुल्सिताँ की कली कली बे-सूद हम-नशीनों की दिल-लगी बे-सूद दिल को लगता है आज रह रह कर जैसे है मेरी ज़िंदगी बे-सूद माह और साल कितने बीत गए बे-सबब बे-हुसूल बे-मंशा हाए लेकिन ये एक इक लम्हा कुछ भी कीजे गुज़र नहीं पाता चुभ रहा है जिगर में इक काँटा काश मेरा भी कोई हो जाता काश मेरा भी कोई हो जाता काश मेरा भी कोई हो जाता

Daud Ghazi

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कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ नज़र में सब्र से बेगाना इक समुंदर है उभरता दबता मचलता बिफर के बढ़ता हुआ कभी उतरता हुआ और उतर के चढ़ता हुआ तमाशा सई-ए-जुनूँ-ख़ेज़ का दिखाता हुआ तिलिस्म-ए-फ़िक्र से अपनी तरफ़ बुलाता हुआ कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ नज़र में एक हुजूम-ए-जिगर-फ़िगार लिए दिल-ओ-दिमाग़ में सौ उलझनों का बार लिए नफ़स नफ़स में ग़म-ए-ज़ीस्त के शरार लिए ख़याल-ओ-फ़िक्र-ओ-तजस्सुस का ख़लफ़शार लिए यक़ीं का जोश लिए वहम-ए-शो'ला-बार लिए कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ नज़र में एक अजब दिल-फ़रेब मंज़र है वहाँ पे दूर ज़रा दूर कुछ ज़रा आगे उफ़ुक़ से हाथ मिलाता हुआ समुंदर है वहाँ पे है कोई कमतर न कोई बेहतर है मदार-ए-ज़ीस्त वहाँ तो बराबरी पर है वहाँ न है कोई ज़ुल्मत न कोई मायूसी हर एक ज़र्रा वहाँ रौशन-ओ-मुनव्वर है पहुँच गया है जो उस अंजुमन में ख़ुश-तर है मैं सोचता हूँ कि एक जस्त में पहुँच जाऊँ उस एक जस्त में जो फ़ासलों की दुश्मन है वहाँ हयात जहाँ क़हर है न उलझन है मगर ठहर ज़रा ऐ दिल ये सोच लूँ पहले पहुँच गया जो मैं उस सरहद-ए-निगाह तलक वहाँ पहुँच के अगर आह ऐसा हो जाए नज़र के सामने जो कुछ था महज़ धोका था वो इक हसीन तसव्वुर था जो कि देखा था वो हद जहाँ कि समुंदर उफ़ुक़ को छूता था कुछ और बढ़ गई आगे जो सरहद-ए-इम्काँ मदार-ए-ज़ीस्त भला फिर बनाएँगे किस को ख़िरद की मंज़िल-ए-आख़िर बनाएँगे किस को ख़िरद की मंज़िल-ए-आख़िर न मिल सकेगी कभी मगर ये ज़ीस्त तो फिर भी गुज़ारनी होगी लगा दूँ जस्त कि ये सरहद-ए-निगाह बहुत हसीन लगती है कल क्या हो ये किसे मालूम कनार-ए-आब सर-ए-शाम आ के बैठा हूँ यक़ीं का जोश लिए अज़्म का ख़ुमार लिए जुनून-ए-शौक़ लिए फ़िक्र-ए-होशियार लिए

Daud Ghazi

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ग़म-ए-हयात के नग़्मों का मैं मुग़न्नी हूँ ग़म-ए-हयात की लज़्ज़त का हूँ मैं शैदाई ये जज़्बा जो दिल-ए-बेताब से फ़ुज़ूँ-तर है कहीं से गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर उड़ा लाई नज़र को देता है ये रौशनी तजस्सुस की ये ग़म बनाता है दिल को दिल-ए-तमन्नाई ये राज़-हा-ए-तग-ओ-दौ को फ़ाश करता है ये राह-रौ को सिखाता है जादा-पैमाई इसी से गर्मी-ए-बज़्म-ए-हयात बाक़ी है यही है दहर के हर इंक़लाब का बानी कहीं न डस ले ये तन्हाई-ए-हयात मुझे तू ग़म से सीख ले आदाब-ए-बज़्म-आराई न कर हिसार-ए-मन-ओ-तू में अपना ग़म महदूद कि हो ये आम तो फिर ज़िंदगी है आफ़ाक़ी

Daud Ghazi

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जब इंसान ने पढ़ना सीखा पढ़ने लगा तहज़ीब की आयत मिट्टी आग हवा और पानी दुश्मन सारे बन गए यार उस की आयत की तफ़्सीरें अब इतनी हैं कि अक़्ल है दंग लेकिन इक ऐसी है बात जिस से कि बनती है बात इन बे-गिनती तफ़सीरों की हर इक इंसाँ इंसाँ है जब इंसान ने पढ़ना सीखा पढ़ने लगा तहज़ीब की आयत गिरने लगीं दीवारें खुलने लगे दरवाज़े जिन लोगों ने दीवारें बनवाई हैं भूल गए तहज़ीब की आयत

Daud Ghazi

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इक नए दौर का आग़ाज़ हुआ दर-ए-आशुफ़्ता-सरी बाज़ हुआ ना-शकेबाई की चलती है हवा बे-यक़ीनी की उभरती है सदा आए मंडलाते हुए अब्र-ए-शुऊ'र लिए हमराह ख़यालात-ए-जसूर मुंतज़िर शौक़ है बेचैन निढाल जाने कब मौसम-ए-बाराँ आए हाए तब्दीली-ए-मौसम की उमीद रंग लाए है ब-तदरीज जुनूँ टूटने वाला है हर एक फ़ुसूँ हाँ ख़ुदाओं की ख़ुदाई का फ़ुसूँ कज-दिमाग़ों की बड़ाई का फ़ुसूँ आ नए दौर तुझे चूम तो लूँ

Daud Ghazi

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