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इक दौर था रोए थे हम इस तौर ख़ुशी थी रोते हुए लोगों ने यही बात कही थी

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ज़ेहन-ओ-दिल में मेरे पेच है इक फँसी तुझ को जाना है तो जा चला जा अभी इश्क़ है तुझ सेे या है महज़ दिल-लगी तुझ को जाना है तो जा चला जा अभी ये तअल्लुक़ भी आसाँ नहीं हम-सफ़र मोड़ आने हैं आएँगे आगे मगर घर पलटने का ये मोड़ है आख़िरी तुझ को जाना है तो जा चला जा अभी

Mohit Dixit

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इस कहानी में कहीं नाम हमारा भी तो था उस सेे कहना कि सिकन्दर कभी हारा भी तो था

Mohit Dixit

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ये शहर आम सा ही शहर है बहिश्त नहीं बस इक अज़ीज़ रहा करता था यहाँ मेरा

Mohit Dixit

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गईं जो सर्दियाँ दरख़्त सूखने लगे हवा भी चीखने लगी ये दिन उदास हैं इन्हीं दिनों की इक सहर जुदा हुए थे हम इसीलिए तो आज भी ये दिन उदास हैं

Mohit Dixit

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आज भी गूँज उठती है भीतर कहीं वो सदा जो तुझे मैं ने दी ही नहीं

Mohit Dixit

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