ख़मोशी चूमता है सुर्ख़ होंठों से सो उस के आने पे चुप्पी सजाई है
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छू लेने दो नाज़ुक होंठों को, कुछ और नहीं हैं जाम हैं ये क़ुदरत ने जो हम को बख़्शा है, वो सब सेे हसीं ईनाम हैं ये
Sahir Ludhianvi
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दिन में आने लगे हैं ख़्वाब मुझे उस ने भेजा है इक गुलाब मुझे
Iftikhar Raghib
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तो क्या उस को मैं होंठों से बजाऊँ तिरे दर पे जो घंटी लग गई है चराग़ उस ने मिरे लौटा दिए हैं अब उस के घर में बिजली लग गई है
Fahmi Badayuni
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आप तो मुँह फेर कर कहते हैं आने के लिए वस्ल का वा'दा ज़रा आँखें मिला कर कीजिए
Lala Madhav Ram Jauhar
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उस ने देखा मुझ को तो कुण्डी लगानी छोड़ दी फिर मिरे होंठों पे इक आधी कहानी छोड़ दी मैं छुपाए फिर रहा था इश्क़ अपने गाँव में और फिर ज़ालिम ने गर्दन पे निशानी छोड़ दी
nakul kumar
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याद आती है तेरी रुस्वाई मौसमों की हसीन पुरवाई उन दिनों मुझ में तुम फ़क़त तुम थे आज मुझ में है बस ये तन्हाई
Sristi Singh
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वफ़ा में आग लग जाए तो अच्छा है हँसी ग़मगीन करने से तो अच्छा है
Sristi Singh
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सभी सौदागरों के ख़्वाब होते हैं हो दुख मेरे तराज़ू पे तो अच्छा है
Sristi Singh
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जब मुसलसल दुखों का समुंदर बहे ग़ैर को दुख बताना तभी चाहिए
Sristi Singh
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निगाहों से कहना ये बच कर रहेंगी वो शाइ'र है और फिर समाँ ओढ़ती है
Sristi Singh
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