ये भी इक रंग है शायद मिरी महरूमी का कोई हँस दे तो मोहब्बत का गुमाँ होता है
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
Mirza Ghalib
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है तुझ सेे जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
Jawwad Sheikh
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अब इक तीर भी हो लिया साथ वर्ना परिंदा चला था सफ़र पर अकेले
Ghulam Mohammad Qasir
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गलियों की उदासी पूछती है घर का सन्नाटा कहता है इस शहर का हर रहने वाला क्यूँँ दूसरे शहर में रहता है
Ghulam Mohammad Qasir
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मैं बदन को दर्द के मल्बूस पहनाता रहा रूह तक फैली हुई मिलती है उर्यानी मुझे
Ghulam Mohammad Qasir
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कोई मुँह फेर लेता है तो 'क़ासिर' अब शिकायत क्या तुझे किस ने कहा था आइने को तोड़ कर ले जा
Ghulam Mohammad Qasir
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हर साल की आख़िरी शामों में दो चार वरक़ उड़ जाते हैं अब और न बिखरे रिश्तों की बोसीदा किताब तो अच्छा हो
Ghulam Mohammad Qasir
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