ghazalKuch Alfaaz

zakhmon ke nae phuul khilane ke liye aa phir mausam-e-gul yaad dilane ke liye aa masti liye ankhon men bikhere hue zulfen aa phir mujhe divana banane ke liye aa ab lutf isi men hai maza hai to isi men aa ai mire mahbub satane ke liye aa aa rakh dahan-e-zakhm pe phir ungliyan apni dil bansuri teri hai bajane ke liye aa haan kuchh bhi to derina mohabbat ka bharam rakh dil se na aa duniya ko dikhane ke liye aa maana ki mire ghar se adavat hi tujhe hai rahne ko na aa aag lagane ke liye aa pyare tiri surat se bhi achchhi hai jo tasvir main ne tujhe rakkhi hai dikhane ke liye, aa ashufta kahe hai koi divana kahe hai main kaun huun duniya ko batane ke liye aa kuchh roz se ham shahr men rusva na hue hain aa phir koi ilzam lagane ke liye aa ab ke jo vo aa jaae to 'ajiz' use le kar mahfil men ghhazal apni sunane ke liye aa zakhmon ke nae phul khilane ke liye aa phir mausam-e-gul yaad dilane ke liye aa masti liye aankhon mein bikhere hue zulfen aa phir mujhe diwana banane ke liye aa ab lutf isi mein hai maza hai to isi mein aa ai mere mahbub satane ke liye aa aa rakh dahan-e-zakhm pe phir ungliyan apni dil bansuri teri hai bajaane ke liye aa han kuchh bhi to derina mohabbat ka bharam rakh dil se na aa duniya ko dikhane ke liye aa mana ki mere ghar se adawat hi tujhe hai rahne ko na aa aag lagane ke liye aa pyare teri surat se bhi achchhi hai jo taswir main ne tujhe rakkhi hai dikhane ke liye, aa aashufta kahe hai koi diwana kahe hai main kaun hun duniya ko batane ke liye aa kuchh roz se hum shahr mein ruswa na hue hain aa phir koi ilzam lagane ke liye aa ab ke jo wo aa jae to 'ajiz' use le kar mahfil mein ghazal apni sunane ke liye aa

Related Ghazal

हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

92 likes

उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है

Tehzeeb Hafi

220 likes

बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है

Tehzeeb Hafi

182 likes

किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है न है फ़िक्र-ए-गर्दिश-ए-आसमाँ न ख़याल-ए-जाँ मुझे फिर ये कैसा मलाल है ये सवाल है वो सवाल जिस का जवाब है मेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी का सवाल है ये सवाल है मैं बिछड़ के तुझ सेे बुलंदियों पे जो पस्त हूँ ये उरूज है कि ज़वाल है ये सवाल है

Abbas Qamar

46 likes

ये प्यार तेरी भूल है क़ुबूल है मैं संग हूँ तू फूल है क़ुबूल है दग़ा भी दूँगा प्यार में कभी कभी कि ये मिरा उसूल है क़ुबूल है तुझे जहाँ अज़ीज़ है तो छोड़ जा मुझे ये शय फ़ुज़ूल है क़ुबूल है तू रूठेगी तो मैं मनाऊँगा नहीं जो रूल है वो रूल है क़ुबूल है लिपट ऐ शाखे गुल मगर ये सोच कर मेरा बदन बबूल है क़ुबूल है यही है गर तिरी रज़ा तो बोल फिर क़ुबूल है क़ुबूल है क़ुबूल है

Varun Anand

42 likes

More from Kaleem Aajiz

मेरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुंचे मुझे डर ये है बुराई तेरे नाम तक न पहुंचे मेरे पास क्या वो आते मेरा दर्द क्या मिटाते मेरा हाल देखने को लब-ए-बाम तक न पहुंचे हो किसी का मुझ पे एहसांये नहीं पसंद मुझ को तेरी सुब्ह की तजल्ली मेरी शाम तक न पहुंचे तेरी बेरुख़ी पे ज़ालिम मेरा जी ये चाहता है कि वफ़ा का मेरे लब पर कभी नाम तक न पहुंचे मैं फ़ुग़ान-ए-बे-असर का कभी मोतरिफ़ नहीं हूँ वो सदा ही क्या जो उन के दर-ओ-बाम तक न पहुंचे वो सनम बिगड़ के मुझ से मेरा क्या बिगाड़ लेगा कभी राज़ खोल दूँ मैं तो सलाम तक न पहुंचे मुझे लज़्ज़त-ए-असीरी का सबक़ पढ़ा रहे हैं जो निकल के आशियांसे कभी दाम तक न पहुंचे उन्हें मेहरबांसमझ लें मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है वो करम का हाथ ही क्या जो अवाम तक न पहुंचे हुए फ़ैज़-ए-मय-कदास सभी फ़ैज़याब लेकिन जो ग़रीब तिश्ना-लब थे वही जाम तक न पहुंचे जिसे मैं ने जगमगाया उसी अंजुमन में साक़ी मेरा ज़िक्र तक न आए मेरा नाम तक न पहुंचे तुम्हें याद ही न आऊंये है और बात वर्ना मैं नहीं हूंदूर इतना कि सलाम तक न पहुंचे

Kaleem Aajiz

1 likes

धड़कता जाता है दिल मुस्कुराने वालों का उठा नहीं है अभी ए'तिबार नालों का ये मुख़्तसर सी है रूदाद-ए-सुब्ह-ए-मय-ख़ाना ज़मीं पे ढेर था टूटे हुए पियालों का ये ख़ौफ़ है कि सबा लड़खड़ा के गिर न पड़े पयाम ले के चली है शिकस्ता-हालों का न आएँ अहल-ए-ख़िरद वादी-ए-जुनूँ की तरफ़ यहाँ गुज़र नहीं दामन बचाने वालों का लिपट लिपट के गले मिल रहे थे ख़ंजर से बड़े ग़ज़ब का कलेजा था मरने वालों का

Kaleem Aajiz

0 likes

मुझे इस का कोई गिला नहीं कि बहार ने मुझे क्या दिया तिरी आरज़ू तो निकाल दी तिरा हौसला तो बढ़ा दिया गो सितम ने तेरे हर इक तरह मुझे ना-उमीद बना दिया ये मिरी वफ़ा का कमाल है कि निबाह कर के दिखा दिया कोई बज़्म हो कोई अंजुमन ये शिआ'र अपना क़दीम है जहाँ रौशनी की कमी मिली वहीं इक चराग़ जला दिया तुझे अब भी मेरे ख़ुलूस का न यक़ीन आए तो क्या करूँँ तिरे गेसुओं को सँवार कर तुझे आइना भी दिखा दिया मेरी शाइ'री में तिरे सिवा कोई माजरा है न मुद्दआ' जो तिरी नज़र का फ़साना था वो मिरी ग़ज़ल ने सुना दिया ये ग़रीब 'आजिज़'-ए-बे-वतन ये ग़ुबार-ए-ख़ातिर-ए-अंजुमन ये ख़राब जिस के लिए हुआ उसी बे-वफ़ा ने भुला दिया

Kaleem Aajiz

0 likes

ये दीवाने कभी पाबंदियों का ग़म नहीं लेंगे गरेबाँ चाक जब तक कर न लेंगे दम नहीं लेंगे लहू देंगे तो लेंगे प्यार मोती हम नहीं लेंगे हमें फूलों के बदले फूल दो शबनम नहीं लेंगे ये ग़म किस ने दिया है पूछ मत ऐ हम-नशीं हम से ज़माना ले रहा है नाम उस का हम नहीं लेंगे मोहब्बत करने वाले भी अजब ख़ुद्दार होते हैं जिगर पर ज़ख़्म लेंगे ज़ख़्म पर मरहम नहीं लेंगे ग़म-ए-दिल ही के मारों को ग़म-ए-अय्याम भी दे दो ग़म इतना लेने वाले क्या अब इतना ग़म नहीं लेंगे सँवारे जा रहे हैं हम उलझती जाती हैं ज़ुल्फ़ें तुम अपने ज़िम्मा लो अब ये बखेड़ा हम नहीं लेंगे शिकायत उन से करना गो मुसीबत मोल लेना है मगर 'आजिज़' ग़ज़ल हम बे-सुनाए दम नहीं लेंगे

Kaleem Aajiz

0 likes

मिरी शाएरी में न रक़्स-ए-जाम न मय की रंग-फ़िशानियाँ वही दुख-भरों की हिकायतें वही दिल-जलों की कहानियाँ ये जो आह-ओ-नाला-ओ-दर्द हैं किसी बे-वफ़ा की निशानियाँ यही मेरे दिन के रफ़ीक़ हैं यही मेरी रात की रानियाँ ये मिरी ज़बाँ पे ग़ज़ल नहीं मैं सुना रहा हूँ कहानियाँ कि किसी के अहद-ए-शबाब पर मिटीं कैसी कैसी जवानियाँ कभी आँसुओं को सुखा गईं मिरे सोज़-ए-दिल की हरारतें कभी दिल की नाव डुबो गईं मिरे आँसुओं की रवानियाँ अभी उस को इस की ख़बर कहाँ कि क़दम कहाँ है नज़र कहाँ अभी मस्लहत का गुज़र कहाँ कि नई नई हैं जवानियाँ ये बयान-ए-हाल ये गुफ़्तुगू है मिरा निचोड़ा हुआ लहू अभी सुन लो मुझ से कि फिर कभू न सुनोगे ऐसी कहानियाँ

Kaleem Aajiz

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Kaleem Aajiz.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Kaleem Aajiz's ghazal.