पाँच दस का छोटा कमरा दो दरवाज़े एक में गंदा पर्दा दूजे में वो भी नहीं बंद खिड़की पैवंद-ज़दा मच्छर-दानी डोलता पलंग बैठो तो तहतुस-सुरा हिल जाए एक औरत आलम-ए-सुपुर्दगी में पाँच दस के नोट खूँटी पे टंगा ओवरकोट लाम से बे-नैल-ओ-मुराम वापस पस्पाई मारका-आराई जंग से हाता-पाई सोचो तो सिदरत-उल-मुंतहा हिल जाए
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”
Zubair Ali Tabish
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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नारस लेता हूँ में क्या तेरा नाम सुब्ह सुब्ह या शाम तेरे आगे जोड़े हाथ मोड़े पाँव बस्ता-लब तू सुनता है मैं जपता हूँ जो दाने आठों पहर सातों दिन तेरे आगे बे-वजूद नारस लेता हूँ मैं क्या तेरा नाम
Wahab Danish
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सरहदें कितनी पुरानी किर्म-ख़ुर्दा हो चुकी हैं जिस्म को अब क्या ज़रूरत रह गई है एक ही कमरे में रह कर वो अलग जलते जज़ीरों में सुलगने की ये दीवारें जिन्हें हर रात नंगा ज़ेहन अपनी खुरदुरी आँखों से ज़ख़्मी कर रहा है एक दिन फिरेगा शायद तुम भी अब महसूस करने ही लगे हो
Wahab Danish
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मुख़ातिब आसमाँ है या ज़मीं मालूम कर लेना कि दोनों के लिए तश्बीब के मिसरे अलग से हैं कहीं ऐसा न हो कि आसमाँ बद-ज़न ज़मीं नाराज़ हो जाए क़सीदे में गुरेज़-ए-ना-रवा का मोड़ आ जाए तिरे सर पे कोई इल्ज़ाम आएद हो कि तू भी अंदलीब-ए-गुलशन-ए-ना-आफ़्रीदा है सुख़न-फ़हमी तिरी गुंजलक बयाँ इबहाम-दीदा है ये मशवरा इस लिए देता हूँ जान-ए-मन कि गर्दिश में घिरा है आसमाँ बरहम तबक़ सारे ज़मीं भी अपने महवर से अलग चक्कर लगाती है क़सीदा सोच के लिखना कहीं इन'आम ओ ख़िलअत की जगह कासा न भर जाए मलामत से ख़जालत से नदामत से
Wahab Danish
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रास्ते में शाम मिल जाएगी तन्हा तुम उसे हम-राह ले कर घूमना सुनसान दरिया के किनारे बैठ जाना जब थकावट पाँव पकड़े बात करने के लिए टीले मिलेंगे गुनगुनाने की अगर ख़्वाहिश हुई तो रोक लेना सरसराती सी हवा को नींद आ जाए तो सौ जाना कहीं भी रात ऐसी ही मिलेगी घर से बाहर
Wahab Danish
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