nazmKuch Alfaaz

वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा न उतरते हुए देखा कभी इल्हाम की सूरत जमा होते हुए इक जगह मगर देखा है शायद आया था वो ख़्वाबों से दबे पाँव ही और जब आया ख़यालों को भी एहसास न था आँख का रंग तुलु होते हुए देखा जिस दिन मैं ने चूमा था मगर वक़्त को पहचाना न था चंद तुतलाए हुए बोलों में आहट भी सुनी दूध का दाँत गिरा था तो वहाँ भी देखा बोसकी बेटी मिरी चिकनी सी रेशम की डली लिपटी-लिपटाई हुई रेशमी तांगों में पड़ी थी मुझ को एहसास नहीं था कि वहाँ वक़्त पड़ा है पालना खोल के जब मैं ने उतारा था उसे बिस्तर पर लोरी के बोलों से इक बार छुआ था उस को बढ़ते नाख़ूनों में हर बार तराशा भी था चूड़ियाँ चढ़ती उतरती थीं कलाई पे मुसलसल और हाथों से उतरती कभी चढ़ती थीं किताबें मुझ को मालूम नहीं था कि वहाँ वक़्त लिखा है वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा जम'अ होते हुए देखा मगर उस को मैं ने इस बरस बोसकी अठारह बरस की होगी चंद तुतलाए हुए बोलों में आहट भी सुनी दूध का दाँत गिरा था तो वहाँ भी देखा बोसकी बेटी मिरी चिकनी सी रेशम की डली लिपटी-लिपटाई हुई रेशमी तांगों में पड़ी थी मुझ को एहसास नहीं था कि वहाँ वक़्त पड़ा है पालना खोल के जब मैं ने उतारा था उसे बिस्तर पर लोरी के बोलों से इक बार छुआ था उस को बढ़ते नाख़ूनों में हर बार तराशा भी थाचूड़ियाँ चढ़ती उतरती थीं कलाई पे मुसलसल और हाथों से उतरती कभी चढ़ती थीं किताबें मुझ को मालूम नहीं था कि वहाँ वक़्त लिखा है वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा जम'अ होते हुए देखा मगर उस को मैं ने इस बरस बोसकी अठारह बरस की होगी

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'हम लड़के हैं' आज आप को सब सच-सच बताते हैं हम किस लिए इतना मुस्कुराते हैं हम को रोना भी आए तो कहाँ रो पाते हैं कोई देख न ले रोता हुआ ये सोच कर डर जाते हैं दर्द सहते हैं और अपने आसुओं को पी जाते हैं हम वो हैं जिन्हें अपने अश्क बहाने से रोका जाता है जिन्हें अपना दर्द सुनाने से रोका जाता है हम वो हैं जो ख़ुद ही ख़ुद का मज़ाक़ बनाते हैं और फिर एक दूजे से सच छिपाते हैं हम सब कुछ कर सकते हैं मगर कभी खुल कर रो नहीं सकते हमारा दर्द हमारे सिवा इस दुनिया में कहाँ कोई समझ पाता है सुख में खुल के हँसते हैं और दुख में झूठ-मूठ का मुस्कुराना आता है हम लड़के हैं साहब हमें बचपन से बस यही सिखाया गया है लड़के रोते नहीं हैं ये बोल-बोल कर पत्थर दिल बनाया गया है अपने मन की करने वाला इस समाज की नज़र में हर लड़का बुरा है अपने आसुओं को पी जाओ दोस्तों हम लड़के हैं हमें रोना मना है

ABhishek Parashar

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"इंतिज़ार" एक उम्र गुज़ार चुके तो महसूस किया है जिसे उम्र भर चाहा वो मग़रूर हुआ है एक शख़्स का इंतिज़ार हर वक़्त किया है वो जा चुका है हमें अब यक़ीन हुआ है तिरे इंतिज़ार ने बालों को सफेद किया है हम समझते रहे ये धूल का किया है

ALI ZUHRI

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"ख़ूब-सूरत अजनबी" मिला है सफ़र में मुझे एक चेहरा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत ख़ुदा ने बनाया है जो उस का मुखड़ा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत मुसलसल उसी को फ़क़त तक रहा हूँ उसी पर मैं इक नज़्म भी कह रहा हूँ वो रक्खी है जो अपने सर पर दुपट्टा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत बहुत क़ातिलाना है उस की निगाहें बहुत जानलेवा है उस की अदाएँ लगाई है जो उस ने आँखों पे चश्मा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत उसे हूर कह के पुकारा है मैं ने ज़रा गुफ़्तुगू कर के देखा है मैं ने उसे बात करने का जो है तरीक़ा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत है मालूम 'दानिश' वो इक अजनबी है मगर उस में हरगिज़ न कोई कमी है जो गुज़रा है उस का मेरे साथ लम्हा बहुत ख़ूब-सूरत बहुत ख़ूब-सूरत

Danish Balliavi

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"वजहें" सुनो! जाने से ऐतराज़ नहीं मुझे पर जाओ, तो लौट आने की वजहें छोड़ जाना आज न सही कल सुलझ जाएंगी क्या सही है इन्हें खींच कर तोड़ देना? या बेहतर है गिरहें रहने देना और वक़्त पर छोड़ देना अदद राब्तों में लाज़िम हैं रुस्वाइयाँ भी जब मनाये कोई तो और रूठना जिरह करना फिर मान जाना बात बिगड़ जाती है चुप रहने से भी सब चुप-चाप सहने से भी कहना कह देना कहने देना ख़ामोशियों के भरोसे मत रहना अब जाओ पर लौट आने की वजहें छोड़ जाना

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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"मुझे मेरे पथ पर जाने दो" क्या बस देह से देह मिले उस को ही परिणय मानोगे तुम कब भावों से भावों के गठबंधन को पहचानोगे कभी सिर्फ़ मधुरिम स्मृति के कुछ पल भी वो कर जाते हैं जब दूर बहुत बैठे हो कर भी मन तृप्त हुए भर जाते हैं परिभाषाओं के इस झंझट में मेरी मानो तो मत उलझो जब शाश्वत को पहचान लिया तो शब्द को क्या पहचानोगे विचलित हूँ तनिक मगर मानो तुम से नहीं ख़ुद से रूठा हूँ क्यूँ देख नहीं पाती हो तुम मैं अपनी शाख से टूटा हूँ थोड़ा सा तो मुझ को भी तुम ख़ुद से मिलने-बतियाने दो माना कि राह निराली है मुझे मेरे पथ पर जाने दो

Gulshan

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वो पुल की सातवीं सीढ़ी पे बैठा कहता रहता था किसी थैले में भर के गर ख़याल अपने मैं दरवाज़े पे हरकारे की सूरत जा के पहुँचाता चमकती बूँदें बारिश की किसी की जेब में भर के गले में बादलों का एक मफ़लर डाल कर आता वो भीगा भीगा सा रहता किसी के कान में दो बालियों से चाँद पहनाता मछेरों की कोई लड़की अगर मिलती गरजते बादलों को बाँध कर बालों के जोड़े में धनक की बीनी दे आता मुझे गर कहकशाँ को बाँटने का हक़ दिया होता ख़ुदा ने तो कोई फ़ुटपाथ से बोला ऐ औलाद शाइ'र की बहुत खाई हैं रूखी रोटियाँ मैं ने जो ला सकता है तो इक बार कुछ सालन ही ला कर दे

Gulzar

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अजीब सा अमल है ये ये एक फ़र्ज़ी गुफ़्तगू, और एकतर्फ़ा— एक ऐसे शख़्स से, ख़याल जिस की शक्ल है ख़याल ही सबूत है!

Gulzar

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देखो, आहिस्ता चलो और भी आहिस्ता ज़रा देखना, सोच-संभल कर ज़रा पाँव रखना ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं कांच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में ख़्वाब टूटे ने कोई, जाग न जाए देखो जाग जाएगा कोई ख़्वाब तो मर जायेगा।

Gulzar

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वो जो शाइ'र था वो जो शाइ'र था चुप-सा रहता था बहकी-बहकी-सी बातें करता था आँखें कानों पे रख के सुनता था गूँगी खामोशियों की आवाज़ें! जमा करता था चाँद के साए और गीली- सी नूर की बूँदें रूखे-रूखे- से रात के पत्ते ओक में भर के खरखराता था वक़्त के इस घनेरे जंगल में कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था हाँ वही, वो अजीब- सा शाइ'र रात को उठ के कोहनियों के बल चाँद की ठोड़ी चूमा करता था चाँद से गिर के मर गया है वो लोग कहते हैं ख़ुद-कुशी की है

Gulzar

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अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो, कि दास्तां आगे और भी है अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो! अभी तो टूटी है कच्ची मिट्टी, अभी तो बस जिस्म ही गिरे हैं अभी तो किरदार ही बुझे हैं। अभी सुलगते हैं रूह के ग़म, अभी धड़कते हैं दर्द दिल के अभी तो एहसास जी रहा है। ये लौ बचा लो जो थक के किरदार की हथेली से गिर पड़ी है ये लौ बचा लो यहीं से जुस्तजू फिर बगूला बन कर यहीं से उठेगा कोई किरदार फिर इसी रौशनी को ले कर कहीं तो अंजान-ए-जुस्तजू के सिरे मिलेंगे अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!

Gulzar

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